ईरान के भूमिगत ठिकाने निशाने पर, ब्रिटिश एयरबेस से अमेरिकी बॉम्बर मिशन की आहट ने बढ़ाया वैश्विक तनाव

मध्य-पूर्व में तनाव तेजी से बढ़ रहा है। खबर है कि अमेरिका ने ब्रिटेन के एयरबेस से ईरान के भूमिगत ठिकानों पर बंकर-बस्टर बम गिराने की तैयारी तेज कर दी है।

Lalit Sharma
Edited By: Lalit Sharma

अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के बीच नई सैन्य तैयारी सामने आई है। रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका ने तीन B-1B लांसर बॉम्बर ब्रिटेन के RAF फेयरफोर्ड एयरबेस पर तैनात कर दिए हैं। माना जा रहा है कि इन विमानों को किसी बड़े मिशन के लिए तैयार रखा गया है। यदि आदेश मिला तो यही विमान ब्रिटेन से उड़ान भरकर ईरान के सैन्य ठिकानों को निशाना बना सकते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम अमेरिका की बदलती सैन्य रणनीति का संकेत है। अब अमेरिका सीधे मध्य-पूर्व से नहीं बल्कि यूरोप के ठिकानों से भी ऑपरेशन चलाने की तैयारी कर रहा है। इससे यह भी संदेश जाता है कि पश्चिमी सहयोगी देश इस पूरे सैन्य अभियान में साथ खड़े दिखाई दे सकते हैं।

B-1B लांसर की बड़ी ताकत

B-1B लांसर अमेरिका का लंबी दूरी तक उड़ान भरने वाला भारी बमवर्षक विमान है। यह विमान एक साथ बड़ी मात्रा में पारंपरिक बम लेकर उड़ सकता है। इसकी खासियत यह है कि यह बहुत दूर तक बिना रुके मिशन पूरा कर सकता है। इसलिए इसे रणनीतिक हमलों के लिए बेहद अहम माना जाता है। इस विमान की गति और पेलोड क्षमता इसे बेहद खतरनाक बनाती है। युद्ध की स्थिति में यह कई प्रकार के हथियारों को साथ लेकर उड़ सकता है। यही वजह है कि अमेरिका अक्सर बड़े सैन्य अभियानों में इस विमान का इस्तेमाल करता है।

बंकर-बस्टर बम क्या होते हैं

बंकर-बस्टर ऐसे खास बम होते हैं जिन्हें जमीन के नीचे छिपे ठिकानों को नष्ट करने के लिए बनाया गया है। इन बमों का मजबूत स्टील कवच उन्हें कंक्रीट और चट्टानों को भेदने में मदद करता है। पहले ये जमीन में गहराई तक प्रवेश करते हैं और फिर विस्फोट करते हैं। इससे भूमिगत बंकर, सुरंग और मिसाइल भंडार भी नष्ट हो सकते हैं। कई विशेषज्ञ बताते हैं कि इन बमों का इस्तेमाल खास तौर पर उन ठिकानों के खिलाफ किया जाता है जो सामान्य बमों से सुरक्षित रहते हैं। अमेरिका के पास ऐसे कई अत्याधुनिक बंकर-बस्टर हथियार मौजूद हैं। इनका उद्देश्य दुश्मन के छिपे हुए सैन्य ढांचे को पूरी तरह तबाह करना होता है।

JDAM किट से बने सटीक हथियार

रिपोर्ट के अनुसार एयरबेस पर ग्राउंड क्रू को JDAM किट से लैस बमों को तैयार करते देखा गया है। JDAM यानी Joint Direct Attack Munition साधारण बमों को GPS-गाइडेड हथियार बना देता है। इससे बम बहुत सटीक निशाना साध सकते हैं। इन्हें 500 पाउंड से लेकर 2000 पाउंड तक के बमों पर लगाया जा सकता है। इस तकनीक की मदद से हमले की सटीकता कई गुना बढ़ जाती है। लक्ष्य को GPS के जरिए चिन्हित कर बम सीधे उसी जगह पर गिराया जा सकता है। आधुनिक युद्ध में इस तरह की तकनीक बेहद अहम मानी जाती है।

ब्रिटेन की भूमिका पर उठे सवाल

इस पूरे घटनाक्रम में ब्रिटेन की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं। शुरुआत में ब्रिटिश सरकार ने कहा था कि उनके ठिकानों का उपयोग सीधे हमलों के लिए नहीं होगा। लेकिन बाद में अमेरिका के अनुरोध को मंजूरी दे दी गई। सरकार का कहना है कि यह कदम मिसाइल खतरे को पहले ही खत्म करने के लिए उठाया गया है। विपक्ष और कई विश्लेषकों ने इस फैसले पर चिंता जताई है। उनका कहना है कि इससे ब्रिटेन सीधे इस संघर्ष में शामिल दिखाई दे सकता है। इससे क्षेत्रीय तनाव और बढ़ने की आशंका भी जताई जा रही है।

मध्य-पूर्व में बढ़ी सैन्य हलचल

युद्ध के बाद से पूरे मध्य-पूर्व में सैन्य गतिविधि तेजी से बढ़ गई है। ब्रिटेन ने पूर्वी भूमध्यसागर में अतिरिक्त सैन्य संसाधन भी भेजे हैं। वहीं सहयोगी देश मिलकर ईरानी ड्रोन और मिसाइल हमलों को रोकने की कोशिश कर रहे हैं। कई देशों ने अपने सैन्य ठिकानों को हाई अलर्ट पर रखा है। समुद्र और आसमान दोनों जगह निगरानी बढ़ा दी गई है। विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर तनाव और बढ़ा तो पूरा क्षेत्र बड़े टकराव की तरफ बढ़ सकता है।

ब्रिटेन में युद्ध को कम समर्थन

ब्रिटेन की जनता इस युद्ध को लेकर पूरी तरह एकजुट नहीं दिख रही है। सिर्फ 10 प्रतिशत लोगों ने ईरान के खिलाफ अमेरिकी सैन्य कार्रवाई का जोरदार समर्थन किया। वहीं बड़ी संख्या में लोगों ने इस कदम पर सवाल उठाए हैं। कई लोगों का मानना है कि इस संघर्ष के पीछे असली कारण अभी स्पष्ट नहीं हैं। सर्वे में काफी लोगों ने कहा कि युद्ध से क्षेत्र में अस्थिरता बढ़ सकती है। जनता का एक बड़ा वर्ग कूटनीतिक समाधान की मांग कर रहा है। उनका कहना है कि युद्ध के बजाय बातचीत से समाधान निकालना ज्यादा बेहतर रास्ता हो सकता है।

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