नई दिल्ली: ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की हत्या को अमेरिका भले ही रणनीतिक सफलता के रूप में पेश कर रहा हो, लेकिन इस घटनाक्रम ने मिडिल ईस्ट में हालात और जटिल कर दिए हैं. 86 वर्षीय खामेनेई की मौत के बाद क्षेत्रीय संतुलन बदल गया है और अमेरिका के सामने नई चुनौतियां खड़ी हो गई हैं.
विशेषज्ञों का मानना है कि जिस समझौते और राजनीतिक दबाव के जरिए अमेरिका ईरान से अपने हित साधना चाहता था, वह रास्ता अब और कठिन हो गया है. सत्ता परिवर्तन, उत्तराधिकार और क्षेत्रीय प्रतिक्रिया जैसे कई मोर्चों पर वॉशिंगटन की रणनीति उलझती दिखाई दे रही है.
ईरान के पास भले ही परमाणु हथियार न हों, लेकिन उसकी मिसाइल क्षमता बेहद मजबूत मानी जाती है. उसके पास करीब 3000 मिसाइलों का जखीरा है, जिनमें लगभग 1200 लंबी दूरी की मिसाइलें शामिल हैं.
इसके अलावा ईरान के पास दुनिया के खतरनाक माने जाने वाले शाहेद ड्रोन भी बड़ी संख्या में मौजूद हैं. एशिया लाइव के अनुसार ईरान के पास करीब 80 हजार शाहेद ड्रोन हैं.
ग्लोबल फायर पावर के मुताबिक ईरान के पास लगभग 6 लाख सक्रिय सैनिक हैं. इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) में करीब 1.5 लाख जवान तैनात हैं. वहीं बासित फोर्स के जरिए लगभग 1 करोड़ लोगों को सैन्य प्रशिक्षण दिया गया है, जिनकी निगरानी IRGC करता है.
ईरान को आशंका थी कि शीर्ष नेतृत्व को निशाना बनाया जा सकता है. इसी को ध्यान में रखते हुए ‘4 प्लस फॉर्मूला’ तैयार किया गया था, जिसके तहत हर प्रमुख पद के लिए चार संभावित उत्तराधिकारी तय किए गए थे. अली लारिजानी का नाम भी संभावित उत्तराधिकारियों में बताया जा रहा है.
ईरान मूल के अमेरिकी विश्लेषक इमान जलाली के मुताबिक, अब स्थिति अस्पष्ट है. पर्दे के पीछे रणनीति बनाई जाएगी, जो अमेरिका के लिए अनुकूल नहीं हो सकती. उनका कहना है कि खामेनेई के बाद संभावित नेता पहले से अधिक कट्टरपंथी हो सकते हैं, जिन्हें झुकाना आसान नहीं होगा.
ईरान में सत्ता परिवर्तन आसान नहीं माना जा रहा. एक्सियोस के अनुसार अमेरिकी राष्ट्रपति चाहते हैं कि ईरानी जनता सड़कों पर उतरे, लेकिन खामेनेई की मौत के बाद स्थिति उलट दिख रही है.
द टेलीग्राफ की रिपोर्ट के मुताबिक यदि अमेरिका ईरान पर नियंत्रण चाहता है तो उसे बड़ी संख्या में सैनिक जमीन पर उतारने होंगे. अनुमान है कि कम से कम 10 लाख सैनिकों की जरूरत पड़ सकती है, जो व्यावहारिक रूप से बेहद कठिन निर्णय होगा.
जेएल पोल के अनुसार अमेरिकी जनता अपने सैनिकों की हानि के लिए तैयार नहीं है. सर्वे में 50 प्रतिशत से अधिक लोगों ने कहा कि वे 10 से ज्यादा सैनिकों की मौत स्वीकार नहीं करेंगे.
ईरान में सरकार के प्रति असंतोष रहा है, लेकिन खामेनेई के प्रति व्यक्तिगत समर्थन मजबूत था. उनकी मौत से इस्लामिक गणराज्य को सहानुभूति का आधार मिल सकता है.
रणनीतिक मामलों के विशेषज्ञ एडम कोचनर के अनुसार अमेरिका ने खामेनेई को धार्मिक शहीद बना दिया है. इससे उनके समर्थक उनके नाम पर और सशक्त राजनीतिक एजेंडा आगे बढ़ा सकते हैं.
अमेरिका ने इजरायल के साथ मिलकर यह कार्रवाई की. अब मिडिल ईस्ट में उसके सहयोगी देशों पर खतरा बढ़ सकता है. ईरान की निगाह यूएई, सऊदी अरब, बहरीन और जॉर्डन जैसे देशों पर है.
ईरान सुरक्षा सर्वोच्च परिषद के सचिव अली लारिजानी ने कहा- "अमेरिका ने ईरान के दिल को मारने का काम किया है. हम भी उसके दिल पर हमला करेंगे." उनका संकेत सऊदी अरब की ओर माना जा रहा है, जिसे क्षेत्र में अमेरिकी रणनीति का केंद्र कहा जाता है.
अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के महासचिव ने टिप्पणी की- "ट्रंप इजरायली जाल में फंस गए हैं और अब उनकी प्राथमिकता अमेरिका नहीं बल्कि इजरायल बन गया है." First Updated : Sunday, 01 March 2026