नई दिल्ली: बांग्लादेश जमात-ए-इस्लामी के प्रमुख शफीकुर रहमान ने भारतीय राजनयिकों के साथ कथित "गुप्त बैठक" की खबरों को सिरे से खारिज कर दिया है. उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि इन मुलाकातों में "कुछ भी गोपनीय नहीं था" और तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश करने के लिए मीडिया के एक वर्ग की कड़ी आलोचना की.
दरअसल, बांग्लादेश के कई मीडिया संस्थानों ने रॉयटर्स के एक विशेष साक्षात्कार का हवाला देते हुए 2025 के मध्य में भारतीय राजनयिकों और जमात प्रमुख के बीच कथित गुप्त बैठकों की खबरें प्रकाशित की थीं. इन रिपोर्टों के सामने आने के बाद शफीकुर रहमान ने सोशल मीडिया के जरिए अपनी स्थिति स्पष्ट की है.
गुरुवार को फेसबुक पर साझा किए गए एक पोस्ट में शफीकुर रहमान ने बताया कि चिकित्सा उपचार के बाद घर लौटने पर उन्होंने पिछले साल के मध्य में दो भारतीय राजनयिकों से मुलाकात की थी. हालांकि, उस समय इन बैठकों को सार्वजनिक नहीं किया गया था, लेकिन उन्होंने जोर देकर कहा कि इन्हें “गुप्त” कहना गलत है.
शफीकुर रहमान ने बंगाली भाषा में लिखा,"हमने उनसे कहा कि राजनयिकों के साथ बैठकें आमतौर पर सार्वजनिक की जाती हैं और हम भी इस मामले में ऐसा ही करना चाहते हैं. उन्होंने अनुरोध किया कि इसे सार्वजनिक न किया जाए. हम सहमत हो गए. इसमें कुछ भी गुप्त नहीं है."
इन कथित बैठकों को लेकर भारत की तरफ से अब तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है. साथ ही यह भी स्पष्ट नहीं हो पाया है कि जिन भारतीय राजनयिकों से मुलाकात हुई थी, वे कौन थे.
शफीकुर रहमान की प्रतिक्रिया रॉयटर्स की उस रिपोर्ट के एक दिन बाद आई है, जो उनके साथ हुए एक साक्षात्कार पर आधारित थी. रिपोर्ट में दावा किया गया था कि जमात-ए-इस्लामी सर्वसम्मति वाली सरकार में शामिल होने के लिए तैयार है.
बांग्लादेश में 12 फरवरी को आम चुनाव होने हैं. यह चुनाव भारत समर्थक सहयोगी शेख हसीना को सत्ता से हटाए जाने के बाद पहला आम चुनाव होगा.
रॉयटर्स ने अपने समाचार लेख में कहा था कि नई दिल्ली बांग्लादेश की अगली सरकार में शामिल होने की संभावना रखने वाली राजनीतिक पार्टियों के साथ अपने संबंधों का दायरा बढ़ाने की कोशिश कर रही है. एजेंसी के अनुसार, इस साल की शुरुआत में बाईपास सर्जरी के बाद एक भारतीय राजनयिक ने शफीकुर रहमान से मुलाकात की थी और अनुरोध किया था कि यह मुलाकात गोपनीय रखी जाए.
भारतीय राजनयिकों से बातचीत को लेकर शफीकुर रहमान ने कहा कि रॉयटर्स के पत्रकार ने उनसे पूछा था कि क्या भारत के अधिकारियों से कोई संपर्क हुआ था. इस पर उन्होंने इलाज के बाद कई देशों के राजनयिकों से हुई मुलाकातों का जिक्र किया, जिनमें भारत के दो राजनयिक भी शामिल थे.
उन्होंने सवाल उठाते हुए कहा,"क्यों? कई राजनयिक मुझसे मिलने आए और यह बात सार्वजनिक भी हो चुकी है. समस्या कहाँ है? इसलिए हमें सबके प्रति और एक-दूसरे के प्रति खुलापन अपनाना होगा. अपने संबंधों को विकसित करने का कोई दूसरा विकल्प नहीं है."
इन खबरों पर नाराजगी जताते हुए जमात प्रमुख ने कहा,"हमारे कुछ स्थानीय मीडिया संस्थानों ने खबरें दी हैं कि जमात के अमीर और भारत के बीच गुप्त बैठकें हुईं. मैं ऐसी खबरों की कड़ी निंदा करता हूं.”
शफीकुर रहमान ने रॉयटर्स को यह भी बताया कि ढाका से भागने के बाद शेख हसीना का भारत में लगातार रहना चिंता का विषय है. उन्होंने कहा कि उनके पतन के बाद से भारत-बांग्लादेश संबंध दशकों में सबसे निचले स्तर पर पहुंच गए हैं.
भारत ने शेख हसीना के कार्यकाल के दौरान उनके साथ घनिष्ठ संबंध बनाए रखे थे और इस दौरान व्यापार व वाणिज्यिक रिश्तों का भी विस्तार हुआ था.
पाकिस्तान के साथ जमात की ऐतिहासिक निकटता पर पूछे गए सवाल के जवाब में शफीकुर रहमान ने कहा कि उनकी पार्टी सभी देशों के साथ संतुलित संबंध चाहती है. उन्होंने कहा,
"हम कभी भी किसी एक देश की ओर झुकाव रखने में रुचि नहीं रखते. बल्कि, हम सभी का सम्मान करते हैं और राष्ट्रों के बीच संतुलित संबंध चाहते हैं."
एक नए जनमत सर्वेक्षण के अनुसार, जमात-ए-इस्लामी और बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) के बीच सिर्फ चार प्रतिशत अंकों का अंतर है. शेख हसीना के शासनकाल में प्रतिबंधित की गई जमात को मोहम्मद यूनुस के अंतरिम प्रशासन के तहत दोबारा सक्रिय किया गया था.
बीएनपी और जमात-ए-इस्लामी पहले भी गठबंधन सहयोगी रह चुके हैं और 2001 से 2006 तक खालिदा जिया के नेतृत्व में सरकार चला चुके हैं.
हालांकि भारत, जिसके बांग्लादेश के साथ गहरे ऐतिहासिक और जन-संबंधी रिश्ते हैं, से यह उम्मीद की जाती है कि वह अगली सरकार बनाने वाली किसी भी पार्टी के साथ संवाद बनाए रखेगा, लेकिन जमात-ए-इस्लामी की संभावित जीत नई दिल्ली के सामने अलग तरह की रणनीतिक चुनौतियां पेश कर सकती है.
इस पार्टी को लंबे समय से पाकिस्तान के प्रति सहानुभूति रखने वाली पार्टी के रूप में देखा जाता रहा है. 1971 के मुक्ति युद्ध के दौरान अत्याचारों में भूमिका के लिए इसके कई वरिष्ठ नेताओं को बांग्लादेश के अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायाधिकरण द्वारा दोषी ठहराए जाने के बाद फांसी दी जा चुकी है.
भारत के लिए पिछली बीएनपी-जमात सरकार का दौर भी चिंता का विषय रहा है, जब सुरक्षा से जुड़ी गंभीर आशंकाएं सामने आई थीं और चरमपंथी व भारत विरोधी संगठन बांग्लादेशी जमीन का इस्तेमाल भारत के खिलाफ गतिविधियों के लिए कर रहे थे. First Updated : Friday, 02 January 2026