घर में अनाज नहीं, दुनिया में शांति कराने चला पाकिस्तान! जिस होटल में हुई अमेरिका-ईरान वार्ता, उसका बिल नहीं चुका पाई शहबाज सरकार

पकिस्तान के इस्लामाबाद के एक होटल में अमेरिका और ईरान के बीच शांति वार्ता हुई, जो की विफल साबित हुआ. अब खबर आ रही है कि उस होटल का बिल भी सरकार चूका नहीं पाई है.

Sonee Srivastav

नई दिल्ली: इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच हुई शांति वार्ता पाकिस्तान के लिए कूटनीतिक मौका बनने की बजाय शर्मिंदगी का सबब बन गई. शहबाज शरीफ सरकार ने वार्ता की मेजबानी के लिए चुने गए लग्जरी सेरेना होटल का बिल चुकाने में असफल रही. यह घटना पाकिस्तान की आर्थिक कमजोरी को एक बार फिर उजागर कर गई है.

होटल मालिक को खुद चुकाना पड़ा खर्च

वार्ता के दौरान सेरेना होटल में हुई बैठकें और ठहरने का पूरा खर्च सरकार नहीं दे पाई. सूत्रों के मुताबिक, स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि होटल के मालिक आगा खान डेवलपमेंट नेटवर्क को खुद आगे आकर यह बिल चुकाना पड़ा. इस लग्जरी होटल को चुनकर पाकिस्तान दुनिया को अपनी मध्यस्थ भूमिका दिखाना चाहता था, लेकिन बिल न चुकाने की वजह से यह एक बड़ी फजीहत बन गई.

कूटनीतिक दावों और हकीकत में बड़ा अंतर

पाकिस्तान इस वार्ता को अपनी विदेश नीति की बड़ी सफलता बताना चाहता था. सेरेना होटल जैसे पांच सितारा स्थान पर आयोजन से यह संदेश देना था कि देश स्थिर और सक्षम है, लेकिन एक साधारण बिल न चुकाना इस बात को साफ करता है कि बड़े-बड़े दावों और जमीनी हकीकत में काफी फर्क है.

कूटनीतिक गलियारों में इस चूक की काफी आलोचना हो रही है. सूत्र कहते हैं कि इतने बड़े अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम में बुनियादी खर्च भी न उठा पाना पाकिस्तान की प्रशासनिक और आर्थिक कमजोरी का प्रमाण है. इससे दुनिया भर में देश की विश्वसनीयता पर सवाल उठ रहे हैं.

आर्थिक संकट और IMF का दबाव

यह घटना ऐसे वक्त में हुई है जब पाकिस्तान पहले से ही गहरे आर्थिक संकट में फंसा है. अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) की सख्त निगरानी में देश महंगाई और वित्तीय चुनौतियों से जूझ रहा है. ऐसे में होटल बिल न चुकाना पाकिस्तान की तंगहाली का प्रतीक बन गया है. यह दिखाता है कि आर्थिक दबाव उसकी विदेश नीति की कोशिशों को भी प्रभावित कर रहा है.

इस्लामाबाद में वार्ता रही बेनतीजा

इस्लामाबाद के सेरेना होटल में 21 घंटे से ज्यादा चली मैराथन बैठकें पूरी तरह नाकाम रही. अमेरिका और ईरान के बीच ईरान के परमाणु कार्यक्रम, हार्मुज जलडमरूमध्य, आर्थिक प्रतिबंध और क्षेत्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दों पर कोई सहमति नहीं बन पाई.

युद्धविराम को मजबूत करने का मकसद अधूरा रह गया. इससे मध्य पूर्व में शांति की उम्मीदों को झटका लगा और पाकिस्तान की मध्यस्थ भूमिका भी कमजोर हुई.

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