अमेरिका को घेरने की तैयारी... ईरान को सपोर्ट कर क्या हासिल करना चाहते हैं रूस-चीन?

यूरोपीय रिपोर्ट के मुताबिक रूस और चीन, ईरान को रणनीतिक रूप से समर्थन देकर अमेरिका की ताकत कमजोर करना चाहते हैं. दोनों देश बिना सीधे टकराव के क्षेत्र में अपना प्रभाव बढ़ा रहे हैं, जिससे वैश्विक शक्ति संतुलन बदलने के संकेत मिल रहे हैं.

Shraddha Mishra

पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच अब एक नया अंतरराष्ट्रीय समीकरण उभरता दिख रहा है. हालिया यूरोपीय रिपोर्ट में दावा किया गया है कि रूस और चीन, ईरान को ऐसे तरीके से समर्थन दे रहे हैं जिससे वे खुद सीधे टकराव से बचें, लेकिन क्षेत्र में अपनी पकड़ भी मजबूत कर सकें. यह स्थिति सिर्फ एक युद्ध तक सीमित नहीं है, बल्कि वैश्विक ताकतों के बीच बदलते संतुलन की ओर इशारा कर रही है.

रिपोर्ट के मुताबिक, रूस और चीन का ईरान के साथ जुड़ाव किसी विचारधारा के कारण नहीं, बल्कि पूरी तरह रणनीतिक सोच पर आधारित है. दोनों देश यह चाहते हैं कि अमेरिका की वैश्विक पकड़ कमजोर हो और दुनिया में शक्ति संतुलन बदल सके.

ईरान इस योजना में एक अहम भूमिका निभा रहा है, क्योंकि वह लंबे समय से अमेरिकी दबाव का सामना कर रहा है.

रूस के लिए क्यों अहम है ईरान

रूस इस समय यूक्रेन युद्ध के चलते पश्चिमी देशों के कड़े प्रतिबंधों से जूझ रहा है. ऐसे में ईरान उसके लिए एक ऐसा सहयोगी बन गया है जो अमेरिका के खिलाफ खड़ा है. रूस, ईरान के साथ सैन्य सहयोग बढ़ाकर अपनी रणनीतिक स्थिति मजबूत करना चाहता है. इससे उसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर समर्थन भी मिलता है और पश्चिमी दबाव का मुकाबला करने में मदद भी मिलती है.

चीन का आर्थिक नजरिया

चीन का दृष्टिकोण थोड़ा अलग है. वह इस क्षेत्र में अपनी आर्थिक ताकत को बढ़ाना चाहता है. रिपोर्ट के अनुसार, चीन अपनी ऊर्जा जरूरतों को सुरक्षित रखने के लिए ईरान के साथ मजबूत संबंध बनाए हुए है. खाड़ी क्षेत्र में निवेश और व्यापारिक गलियारों के जरिए चीन अपनी पकड़ बढ़ाना चाहता है, जिससे उसे लंबे समय तक आर्थिक फायदा मिल सके.

परोक्ष लाभ, सीधा जोखिम ईरान पर

विश्लेषण में यह भी कहा गया है कि इस पूरे घटनाक्रम में ईरान सीधे संघर्ष की कीमत चुका रहा है, जबकि रूस और चीन को इसका परोक्ष लाभ मिल रहा है. दोनों देश बिना सीधे युद्ध में उतरे अपने हित साध रहे हैं और वैश्विक राजनीति में अपनी स्थिति मजबूत कर रहे हैं.

यह स्थिति केवल क्षेत्रीय तनाव तक सीमित नहीं है. रिपोर्ट के अनुसार, यह संकेत है कि दुनिया में शक्ति संतुलन धीरे-धीरे बदल रहा है. रूस और चीन ऐसे देशों का समूह तैयार करने की कोशिश कर रहे हैं जो अमेरिकी प्रतिबंधों के बावजूद स्वतंत्र नीति अपनाने की क्षमता रखते हों.

चुनौतियां भी कम नहीं

हालांकि, इस रणनीति के साथ कुछ जोखिम भी जुड़े हुए हैं. अगर चीन ईरान के ज्यादा करीब आता है, तो खाड़ी के कई देश फिर से अमेरिका के साथ मजबूत रिश्ते बना सकते हैं. वहीं, रूस के सामने भी चुनौती है, क्योंकि उसे अपने सैन्य संसाधनों का सही तरीके से इस्तेमाल करना पड़ रहा है, खासकर यूक्रेन युद्ध के बीच.

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