'वे हमारे प्रति कर्जदार...', इस्लामिक देशों को ट्रंप की दो टूक, अब्राहम अकॉर्ड से जोड़ी ईरान पीस डील
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने मिडिल ईस्ट की राजनीति में बड़ा दांव चलते हुए ईरान पीस डील को अब्राहम अकॉर्ड से जोड़ दिया है. ट्रंप ने साफ कहा कि अगर खाड़ी और इस्लामिक देश इजरायल के साथ रिश्ते सामान्य करने वाले समझौते में शामिल नहीं होते हैं, तो अमेरिका ईरान के साथ डील पर दोबारा विचार कर सकता है.

नई दिल्ली: मिडिल ईस्ट में जारी तनाव और ईरान के साथ संभावित शांति समझौते के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बड़ा कूटनीतिक संकेत दिया है. ट्रंप ने साफ कर दिया कि खाड़ी देशों को इजरायल के साथ संबंध सामान्य करने वाले अब्राहम अकॉर्ड में शामिल होना चाहिए, अन्यथा अमेरिका ईरान के साथ डील पर दोबारा विचार कर सकता है.
कैबिनेट बैठक के दौरान ट्रंप ने सऊदी अरब, कतर, पाकिस्तान, तुर्किये और मिस्र जैसे देशों से समझौते में शामिल होने की अपील की. उन्होंने कहा कि यदि ये देश इस पहल का हिस्सा बनते हैं तो यह मिडिल ईस्ट के इतिहास में एक बड़ा बदलाव साबित हो सकता है. ट्रंप के बयान के बाद क्षेत्रीय राजनीति और कूटनीति को लेकर नई चर्चाएं शुरू हो गई हैं.
ट्रंप ने क्या कहा?
कैबिनेट मीटिंग के दौरान ट्रंप ने कहा कि सऊदी अरब, कतर और अन्य देशों को तुरंत इस समझौते का हिस्सा बनना चाहिए. उन्होंने कहा, "मुझे लगता है कि वे हमारे प्रति यह जिम्मेदारी निभाने के कर्जदार हैं. अगर वे ऐसा करते हैं तो यह ऐतिहासिक होगा."
ट्रंप ने यह भी बताया कि उनके विशेष दूत स्टीव विटकॉफ और जारेड कुशनर लगातार इस दिशा में काम कर रहे हैं. पत्रकारों से बातचीत के दौरान ट्रंप ने विटकॉफ से पूछा कि क्या और देशों को इस समझौते में शामिल कराया जा सकता है. इस पर विटकॉफ ने जवाब दिया, "हम इस पर पूरी ताकत से काम कर रहे हैं."
इसके बाद ट्रंप ने संकेत दिया कि यदि खाड़ी देश इस समझौते का हिस्सा नहीं बनते हैं तो अमेरिका मिडिल ईस्ट में अपने शांति प्रयासों को सीमित कर सकता है. उन्होंने कहा, "अगर वे हस्ताक्षर नहीं करते हैं तो मुझे नहीं लगता कि हमें डील करनी चाहिए."
क्या है अब्राहम अकॉर्ड?
अब्राहम अकॉर्ड की शुरुआत साल 2020 में डोनाल्ड ट्रंप के पहले राष्ट्रपति कार्यकाल के दौरान हुई थी. इस समझौते का नाम इब्राहिम (अब्राहम) के नाम पर रखा गया, जिन्हें यहूदी, ईसाई और इस्लाम तीनों धर्मों में मान्यता प्राप्त है.
इस समझौते का मुख्य उद्देश्य इजरायल और अरब देशों के बीच राजनयिक और आर्थिक संबंध स्थापित करना था. सबसे पहले संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और बहरीन ने इजरायल के साथ संबंध सामान्य किए. बाद में मोरक्को और सूडान भी इस पहल में शामिल हुए.
इसके बाद व्यापार, टेक्नोलॉजी, पर्यटन, कृषि और स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों में कई समझौते हुए. अमेरिका का दावा है कि इस पहल ने मिडिल ईस्ट में नए व्यापारिक रास्ते और आर्थिक साझेदारी के अवसर खोले हैं. इसे 1979 में मिस्र और 1994 में जॉर्डन द्वारा इजरायल के साथ की गई शांति संधियों के बाद क्षेत्र का सबसे बड़ा कूटनीतिक बदलाव माना जाता है.
ट्रंप ने किन देशों का लिया नाम?
अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'ट्रुथ सोशल' पर ट्रंप ने सऊदी अरब, कतर, पाकिस्तान, तुर्की, मिस्र और जॉर्डन को संभावित हस्ताक्षरकर्ताओं के रूप में बताया था. उन्होंने कहा था कि जो देश इस समझौते से दूर रह रहे हैं, वे बुरी नीयत दिखा रहे हैं.
ट्रंप का मानना है कि इस समझौते के विस्तार से एक मजबूत और एकजुट मिडिल ईस्ट का निर्माण होगा. उन्होंने यहां तक कहा कि भविष्य में ईरान भी इस गठबंधन का हिस्सा बन सकता है. ट्रंप ने लिखा, "इस अद्वितीय विश्व गठबंधन का हिस्सा बनने के लिए उनका (ईरान) स्वागत करना हमारे लिए सम्मान की बात होगी."
क्यों पीछे हट रहे हैं खाड़ी देश?
ट्रंप भले ही अब्राहम अकॉर्ड को मिडिल ईस्ट की सबसे बड़ी कूटनीतिक सफलता बता रहे हों, लेकिन कई देशों के सामने राजनीतिक और धार्मिक चुनौतियां बनी हुई हैं.
सऊदी अरब ने स्पष्ट किया है कि इजरायल के साथ संबंध सामान्य करने से पहले फिलिस्तीन को स्वतंत्र राष्ट्र का दर्जा देने की दिशा में ठोस और गंभीर प्रगति होनी चाहिए.
वहीं पाकिस्तान ने इजरायल को मान्यता देने और इस समझौते में शामिल होने की संभावनाओं को पूरी तरह खारिज कर दिया है. कतर भी खुद को क्षेत्रीय विवादों में एक निष्पक्ष मध्यस्थ के रूप में देखता है और उसके हमास के साथ संबंध हैं, इसलिए निकट भविष्य में उसके इस समझौते में शामिल होने की संभावना बेहद कम मानी जा रही है.
दूसरी ओर, इजरायल के विरोधी रुख के कारण ईरान का इस गठबंधन में शामिल होना फिलहाल पूरी तरह अवास्तविक माना जा रहा है.


