मिडिल ईस्ट की राजनीति एक बार फिर गहरे संकट में डूब गई है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पिछले साल मई में दिए भाषण में साफ कहा था कि अमेरिका अब मिडिल ईस्ट में सरकारें बदलने या नेशन बिल्डिंग की नीति नहीं अपनाएगा. उन्होंने पूर्ववर्ती राष्ट्रपतियों पर निशाना साधते हुए कहा था कि इराक और अफगानिस्तान जैसे देशों में दखल से हालात और बिगड़े. लेकिन महज एक साल के भीतर ही ट्रंप ने ईरान पर बड़े पैमाने पर सैन्य हमला शुरू कर दिया. इस कदम को वे ईरान को आजादी दिलाने और अमेरिकी सुरक्षा के लिए जरूरी बता रहे हैं, जो उनकी पुरानी घोषित नीति से बिल्कुल उलट है.
ट्रंप ने खुद को शांति का राष्ट्रपति कहकर चुनाव जीता था, लेकिन अब इजरायल के साथ मिलकर ईरान की लीडरशिप को निशाना बनाया जा रहा है. इस हमले में ईरान के सुप्रीम लीडर अली खामेनेई सहित कई शीर्ष नेता मारे गए हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि यह युद्ध इजरायल के लिए रणनीतिक जीत है, जबकि अमेरिका एक बड़े जोखिम में फंस गया है.
ट्रंप ने चुनाव प्रचार और राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति में मध्य पूर्व को कम प्राथमिकता देने की बात कही थी. लेकिन अब ईरान पर हमला उनकी उसी नीति का उलटा है, जिसकी वे आलोचना करते रहे. कई जानकार इसे इजरायल के दबाव से जोड़ते हैं.
विशेषज्ञों का कहना है कि इस युद्ध से सबसे ज्यादा लाभ इजरायल और प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को मिल रहा है. नेतन्याहू पिछले दो दशकों से ईरान को इजरायल के लिए सबसे बड़ा खतरा बता रहे हैं. उन्होंने परमाणु कार्यक्रम और बैलिस्टिक मिसाइलों को मुद्दा बनाया, जबकि ईरान इन आरोपों से इनकार करता रहा है. अमेरिकी अधिकारियों ने भी कई बार कहा कि ईरान परमाणु बम बनाने के करीब नहीं है.
पिछले साल जून में 12 दिनों की जंग में अमेरिका ने ईरान के परमाणु ठिकानों पर हमला किया और ट्रंप ने दावा किया कि कार्यक्रम पूरी तरह खत्म हो गया. उसके बाद नेतन्याहू ने लॉन्ग रेंज बैलिस्टिक मिसाइलों का मुद्दा उठाया. उन्होंने कहा कि ईरान ऐसी मिसाइलें बना रहा है जो अमेरिका तक पहुंच सकती हैं. ईरान ने बार-बार कहा कि उसने जानबूझकर मिसाइलों की रेंज सीमित रखी है.
अमेरिका में युद्ध को लेकर गहरे मतभेद हैं. इराक-अफगानिस्तान युद्धों के बाद जनता नए संघर्ष से थक चुकी है. एक सर्वे में सिर्फ 21 प्रतिशत लोग ईरान युद्ध के पक्ष में हैं. युद्ध के पहले दिन ईरान ने अमेरिकी ठिकानों पर मिसाइलें दागीं, जिससे क्षेत्र अस्थिर हो गया.
युद्ध से पहले ओमान की मध्यस्थता में अमेरिका-ईरान बातचीत चल रही थी. ईरान परमाणु कार्यक्रम पर सख्त निगरानी देने को तैयार था. लेकिन इसी दौरान हमला हो गया. कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि नेतन्याहू किसी समझौते के खिलाफ थे.
इस युद्ध से इजरायल को राजनीतिक और रणनीतिक लाभ मिला है. अमेरिका ने इजरायल के टारगेट को पूरा करने में मदद की. ईरान को भारी सैन्य नुकसान हुआ, सुप्रीम लीडर खामेनेई सहित कई नेता मारे गए. अमेरिका के लिए यह अमेरिका फर्स्ट नीति से अलग जोखिम भरा कदम है. ईरान इसे संप्रभुता की लड़ाई बताकर घरेलू समर्थन जुटा रहा है.
युद्ध अगर लंबा चला तो पूरा मध्य पूर्व प्रभावित होगा. स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बंद होने से तेल कीमतें आसमान छू सकती हैं. फिलहाल इजरायल को तात्कालिक फायदा दिख रहा है, जबकि अमेरिका और ईरान दोनों बड़े जोखिम में हैं. First Updated : Sunday, 01 March 2026