ईरान की अरबों डॉलर की संपत्तियों पर अमेरिका की नजर! खाड़ी देशों के नुकसान की भरपाई करेगा US?
अमेरिका ईरान की प्रतिबंधित संपत्तियों के उपयोग को लेकर नई रणनीति पर विचार कर रहा है. इसके साथ ही अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने अधिकारियों को निर्देश दिया है कि वे ईरानी हमलों से हुए नुकसान का विस्तृत आकलन करें.

नई दिल्ली: अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे तनाव के बीच एक नई और अहम जानकारी सामने आई है. रिपोर्ट्स के मुताबिक, वाशिंगटन अब उन ईरानी संपत्तियों के इस्तेमाल पर विचार कर रहा है जिन्हें वर्षों से प्रतिबंधों के तहत रोका गया है. बताया जा रहा है कि इन फंड्स का उपयोग उन खाड़ी देशों की मदद के लिए किया जा सकता है जिन्हें हालिया ईरानी हमलों में नुकसान पहुंचा है. रॉयटर्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, मामले से जुड़े एक सूत्र ने बताया कि अमेरिका इस संभावना पर काम कर रहा है कि विदेशों में मौजूद कुछ ईरानी संपत्तियों को खाड़ी देशों के पुनर्निर्माण और नुकसान की भरपाई के लिए इस्तेमाल किया जाए.
सूत्र के मुताबिक, अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने अधिकारियों को निर्देश दिया है कि वे ईरानी हमलों से हुए नुकसान का विस्तृत आकलन करें. साथ ही यह भी जांच की जा रही है कि क्या जब्त या प्रतिबंधित ईरानी संपत्तियों का इस्तेमाल इन खर्चों को पूरा करने में किया जा सकता है. हालांकि अभी यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि किन संपत्तियों को इस योजना में शामिल किया जाएगा.
कूटनीतिक प्रयासों पर पड़ सकता है असर
यह प्रस्ताव ऐसे समय सामने आया है जब अमेरिका और ईरान के बीच कई संवेदनशील मुद्दों पर बातचीत चल रही है. ईरान लंबे समय से विदेशों में फंसे अपने अरबों डॉलर के फंड तक पहुंच की मांग करता रहा है. विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अमेरिका वास्तव में इन संपत्तियों का उपयोग अन्य देशों के नुकसान की भरपाई के लिए करता है तो दोनों देशों के बीच चल रहे संवाद पर इसका सीधा प्रभाव पड़ सकता है. इससे पहले से जटिल हो चुके संबंधों में नया तनाव पैदा होने की संभावना भी जताई जा रही है.
युद्धविराम के बावजूद जारी हैं सैन्य कार्रवाइयां
हालांकि अमेरिका और ईरान के बीच युद्धविराम लागू है, लेकिन हाल के दिनों में कई घटनाओं ने इसकी मजबूती पर सवाल खड़े कर दिए हैं. अमेरिकी सेना ने शनिवार तड़के ईरान के कुछ तटीय सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया. अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि यह कार्रवाई उन ड्रोन गतिविधियों के जवाब में की गई जो समुद्री सुरक्षा के लिए खतरा मानी जा रही थीं.
इसके जवाब में ईरान ने कुवैत और बहरीन में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों की ओर मिसाइलें दागीं. कुवैत के अनुसार कई मिसाइलें आबादी वाले इलाकों के ऊपर से गुजरीं, हालांकि किसी के हताहत होने की सूचना नहीं मिली. बहरीन में भी एहतियातन चेतावनी सायरन बजाए गए और लोगों को सुरक्षित स्थानों पर जाने को कहा गया.
दोनों देशों के दावे अलग-अलग
ईरान की रिवोल्यूशनरी गार्ड ने दावा किया कि उसने अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाया है. वहीं अमेरिकी सेना का कहना है कि अधिकांश मिसाइलों को रास्ते में ही रोक दिया गया और कोई बड़ा नुकसान नहीं हुआ. इन घटनाओं ने यह साफ कर दिया है कि युद्धविराम के बावजूद क्षेत्र में तनाव पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है. हालात अब भी बेहद संवेदनशील बने हुए हैं.
मध्यस्थता में पाकिस्तान की सक्रिय भूमिका
तनाव के बीच बातचीत के रास्ते खुले रखने की कोशिश भी जारी है. पाकिस्तान इस समय दोनों देशों के बीच एक अहम मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा है. पाकिस्तान के गृह मंत्री मोहसिन नकवी हाल ही में तेहरान पहुंचे. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, वह पाकिस्तान के शीर्ष राजनीतिक और सैन्य नेतृत्व का संदेश लेकर ईरानी नेतृत्व से मुलाकात करने गए हैं. माना जा रहा है कि यह दौरा दोनों पक्षों के बीच संवाद को आगे बढ़ाने की कोशिश का हिस्सा है.
ईरान की प्रमुख मांगें बरकरार
ईरान अब भी अपने जमे हुए विदेशी फंड्स तक पहुंच चाहता है. इसके अलावा वह तेल निर्यात से जुड़े प्रतिबंधों में राहत और अपने आर्थिक हितों की सुरक्षा की मांग कर रहा है. ईरानी नेतृत्व के करीबी सूत्रों का कहना है कि विदेशों में रोकी गई अरबों डॉलर की संपत्तियों की रिहाई किसी भी व्यापक समझौते का महत्वपूर्ण हिस्सा हो सकती है.
लेबनान में भी बढ़ी चिंता
क्षेत्रीय तनाव केवल खाड़ी देशों तक सीमित नहीं है. लेबनान में भी हालात चिंताजनक बने हुए हैं. हाल ही में दक्षिणी लेबनान में हुए एक हमले में सेना के कई जवानों की मौत हो गई. इस घटना ने मध्य पूर्व की सुरक्षा स्थिति को और जटिल बना दिया है. साथ ही यह भी संकेत दिया है कि किसी स्थायी शांति समझौते तक पहुंचना अभी आसान नहीं होगा.
विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका द्वारा ईरानी संपत्तियों के उपयोग पर विचार एक बड़ा राजनीतिक संदेश है. लेकिन यह कदम जितना आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण है, उतना ही कूटनीतिक रूप से संवेदनशील भी साबित हो सकता है. एक तरफ बातचीत और मध्यस्थता के प्रयास जारी हैं, वहीं दूसरी ओर सैन्य गतिविधियां रुकने का नाम नहीं ले रही हैं. ऐसे में आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि दोनों देश तनाव कम करने की दिशा में आगे बढ़ते हैं या हालात फिर से टकराव की ओर मुड़ते हैं.


