800 साल पुराना है गुजिया का इतिहास, तुर्की से भारत तक का सफर... ऐसे बदलता गया स्वाद और रूप

होली की शान मानी जाने वाली गुजिया सिर्फ एक मिठाई नहीं, बल्कि सदियों पुरानी परंपरा की मिठास है. 13वीं सदी से लेकर आज तक इसका स्वाद, स्वरूप और नाम बदलता रहा, लेकिन इसकी लोकप्रियता कभी कम नहीं हुई।

Yogita Pandey
Edited By: Yogita Pandey

नई दिल्ली: होली का नाम लेते ही जिस मिठास की खुशबू सबसे पहले मन को छूती है, वह है गुजिया. घी में तली सुनहरी परत, अंदर भरा इलायची महकता मावा और कुरकुरे मेवे-यह स्वाद सिर्फ एक मिठाई नहीं, बल्कि परंपरा का हिस्सा है. उत्तर भारत में आधे चांद के आकार की यह मिठाई त्योहारों की पहचान बन चुकी है.

लेकिन क्या आप जानते हैं कि गुजिया का इतिहास केवल भारतीय रसोई तक सीमित नहीं है? कई इतिहासकार मानते हैं कि इसका संबंध तुर्की की मशहूर डिश बकलावा से भी जोड़ा जाता है. समय के साथ यह मिठाई अलग-अलग संस्कृतियों और रसोइयों से गुजरते हुए आज के रूप में हमारे सामने आई है.

13वीं सदी से मिलते हैं गुजिया के संकेत

इतिहासकारों के मुताबिक, गुजिया का प्रारंभिक स्वरूप 13वीं शताब्दी के आसपास भारतीय खानपान का हिस्सा बन चुका था. संस्कृत और क्षेत्रीय ग्रंथों में 'गूंझा' (Gunjha) नामक पकवान का उल्लेख मिलता है. इससे अंदाजा लगाया जाता है कि गुजिया का इतिहास लगभग 700 से 800 वर्ष पुराना है.

भारत के प्रसिद्ध फूड हिस्टोरियन के.टी. अचाया (K.T. Achaya) ने अपनी पुस्तकों 'ए हिस्टोरिकल डिक्शनरी ऑफ इंडियन फूड' और 'द स्टोरी ऑफ फूड' में भारतीय व्यंजनों के विकास का विस्तृत वर्णन किया है. उनके अनुसार, भरवां और तली हुई पेस्ट्री की परंपरा भारत में सदियों पुरानी है, जो समय और क्षेत्र के अनुसार बदलती रही. 13वीं-14वीं शताब्दी के साहित्य में ‘गंझा’ या ‘पूरी’ जैसे पकवानों का जिक्र मिलता है, जिन्हें गुजिया का प्रारंभिक रूप माना जाता है.

तुर्की कनेक्शन और बकलावा से समानता

कुछ फूड हिस्टोरियंस गुजिया की अवधारणा को तुर्की की प्रसिद्ध मिठाई बकलावा से जोड़ते हैं. बकलावा एक परतदार, मीठी और ड्राईफ्रूट से भरी पेस्ट्री है, जिसे तुर्की के सुल्तानों और अमीर वर्ग की पसंदीदा डिश माना जाता था.

रिपोर्ट्स के अनुसार, मध्य एशिया के व्यापारी जब भारत आए, तो वे समोसा और बकलावा जैसी डिशेज साथ लाए. समय के साथ समोसा नमकीन रूप में विकसित हुआ, जबकि बकलावा में भारतीय स्वाद का मेल कर उसे नया स्वरूप दिया गया. तुर्की में मैदे की परतों के बीच ड्राईफ्रूट भरने की परंपरा थी, जिसे भारत में मावा (खोया) के साथ बदल दिया गया और इस तरह गुजिया का जन्म हुआ.

बुंदेलखंड बना गुजिया का 'गढ़'

इतिहासकार बुंदेलखंड को गुजिया का प्रमुख केंद्र मानते हैं. मध्यकालीन दौर में जब उत्तर भारत के खानपान में बदलाव हो रहे थे, तब बुंदेलखंड के राजाओं और शाही रसोइयों ने 'चंद्रकला' यानी गोल गुजिया का निर्माण किया. यहीं से यह मिठाई ब्रज क्षेत्र और फिर उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और बिहार तक फैल गई.

इतिहासकार संजेश त्रिपाठी के हवाले से रिपोर्ट में बताया गया है कि व्यापार के सिलसिले में बाहर गए लोगों ने पेस्ट्री का विचार भारत लाकर स्थानीय सामग्री गेहूं या मिलेट के आटे, खोया और सूखे मेवों के साथ इसे नया रूप दिया.

ब्रज और मुगल काल में शाही पहचान

ब्रज (मथुरा-वृंदावन) में 16वीं सदी के दौरान गुजिया को इलायची और मेवों के साथ भगवान कृष्ण को प्रसाद के रूप में चढ़ाया जाता था. भक्ति काल में जब 56 भोग की परंपरा शुरू हुई, तब ‘चंद्रकला’ और ‘गुजिया’ जैसे पकवान उसमें शामिल थे. मंदिरों के पुराने रिकॉर्ड बताते हैं कि यह मिठाई लगभग 500 वर्षों से यहां बनाई जा रही है.

मुगल काल में इसे और अधिक शाही रूप मिला. केसर और महंगे मेवों का उपयोग बढ़ा और इसका स्वाद और समृद्ध हुआ.

समय के साथ कैसे बदली गुजिया?

गुजिया का स्वरूप सदियों में कई बदलावों से गुजरा—

  • 13वीं सदी: ‘गूंझा’ के रूप में सादे मीठे पकोड़े या पूरी जैसा रूप
  • 15वीं-16वीं सदी: मध्य एशियाई प्रभाव से मावा और बारीक मेवों की फिलिंग शुरू
  • मुगल काल: केसर और शाही मेवों के साथ समृद्ध रूप
  • आज: पारंपरिक मावा के अलावा चॉकलेट, केसर, शुगर-फ्री जैसे आधुनिक फ्लेवर

हर राज्य में अलग नाम और स्वाद

गुजिया जहां-जहां पहुंची, वहां उसने स्थानीय स्वाद अपना लिया -

  • महाराष्ट्र और गुजरात: करंजी, जिसमें नारियल और गुड़ का प्रयोग
  • बिहार और झारखंड: पिड़किया, जिसमें सूजी और खोया का मिश्रण
  • कर्नाटक: कर्जीकाई, जिसमें खसखस और नारियल की फिलिंग

भले ही गुजिया का इतिहास तुर्की दरबार से जुड़ा हो या बुंदेलखंड की शाही रसोई से, आज इसकी असली पहचान इसका स्वाद और खुशबू है. हर त्योहार में यह मिठाई न केवल मिठास घोलती है, बल्कि सदियों पुरानी सांस्कृतिक विरासत को भी जीवित रखती है.

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