नई दिल्ली: बदलते समय के साथ बच्चों की परवरिश के तरीके भी तेजी से बदल रहे हैं. आज के दौर में माता-पिता नए-नए पेरेंटिंग स्टाइल अपना रहे हैं, ताकि बच्चों को बेहतर तरीके से समझा और संभाला जा सके. इन्हीं में से एक है FAFO पेरेंटिंग, जो इन दिनों काफी चर्चा में है.
कहा जा रहा है कि यह पेरेंटिंग स्टाइल बच्चों को आत्मनिर्भर और जिम्मेदार बनाता है, लेकिन इसके साथ ही इसके कुछ जोखिम भी जुड़े हुए हैं. ऐसे में यह समझना जरूरी है कि FAFO पेरेंटिंग क्या है और इसे अपनाने से बच्चों पर क्या प्रभाव पड़ता है.
FAFO पेरेंटिंग का मतलब है कि बच्चा अपनी गलती से खुद सीखे और उसके परिणाम को भी समझे. यह कोई नया तरीका नहीं है, बल्कि पुराने सिद्धांत को नए नाम के साथ पेश किया गया है.
इस पेरेंटिंग स्टाइल में माता-पिता बच्चों को हर छोटी बात पर रोकने-टोकने के बजाय उन्हें खुद अनुभव करने देते हैं. जैसे अगर बच्चा खाना नहीं खाता है, तो उसे तुरंत दूसरा विकल्प नहीं दिया जाता. जब उसे भूख लगेगी, तब ही उसे खाना मिलेगा.
इसी तरह अगर बच्चा कोई चीज तोड़ देता है, तो उसे तुरंत नया खिलौना नहीं दिया जाता, जिससे उसे चीजों की अहमियत समझ आती है.
जहां इसके फायदे हैं, वहीं कुछ नुकसान भी सामने आते हैं, जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.
यह पेरेंटिंग स्टाइल आमतौर पर 5-6 साल के बच्चों के लिए ज्यादा प्रभावी माना जाता है.
छोटे बच्चे, खासकर 3-4 साल के, अभी उतनी समझ नहीं रखते, इसलिए उनके लिए यह तरीका नुकसानदायक हो सकता है.
अगर माता-पिता इस पेरेंटिंग स्टाइल को अपनाते हैं, तो उन्हें कुछ जरूरी बातों का ध्यान रखना चाहिए. बच्चे की गतिविधियों पर नजर रखना जरूरी है और जहां जरूरत हो, वहां समझाना या डांटना भी जरूरी है.
जैसे समय पर होमवर्क करना, मोबाइल से दूरी बनाए रखना जैसी आदतें बच्चों को सिखाना जरूरी है. प्यार और समझदारी के साथ बच्चे को सही दिशा दी जा सकती है. First Updated : Tuesday, 14 April 2026