महाभारत से मुगल दरबार तक, कैसे विकसित हुई होली की परंपरा?

होली की परंपरा वैदिक युग, महाभारत और वसंतोत्सव से जुड़ी प्राचीन सांस्कृतिक धारा से विकसित होकर आज के रंगों वाले उत्सव में बदली है. मुगल काल से लेकर भक्ति और सूफी परंपरा तक यह पर्व भारतीय समाज में प्रेम, उल्लास और सांस्कृतिक एकता का प्रतीक बनकर कायम रहा है.

Suraj Mishra
Edited By: Suraj Mishra

भारत की सांस्कृतिक परंपराओं में होली का स्थान विशिष्ट है. रंग, अबीर-गुलाल और हंसी-मजाक के साथ इसे जीया जाता है. इसकी जड़ें बहुत गहरी और प्राचीन हैं. महाकाव्य महाभारत के आदिपर्व में राजा उपरिचर की कथा मिलती है. कहा जाता है कि देवराज इंद्र ने उन्हें मित्रता के प्रतीक के रूप में एक दंड (छड़ी) भेंट किया था. राजा ने उसे ऊंचे स्थान पर स्थापित कर दिया और हर वर्ष वसंत ऋतु में वहां उत्सव आयोजित करने लगे. उस अवसर पर राजकाज ठहर जाता, कर वसूली बंद रहती और लोग उल्लास में डूब जाते. 

मान्यता थी कि इंद्र स्वयं हंस रूप में आकर इस उत्सव में शामिल होते. यह आयोजन वर्षचक्र के पूर्ण होने का प्रतीक था और ‘संवत्सर उत्सव’ के रूप में जाना गया. इसी परंपरा को होली के प्रारंभिक सांस्कृतिक रूप से जोड़ा जाता है.

 ‘होला’ किसे कहा जाता था? 

वैदिक युग में यह पर्व ‘नवात्रैष्टि यज्ञ’ के रूप में भी प्रचलित था. नई फसल के आगमन पर अन्न को अग्नि में अर्पित कर समुदाय के साथ बांटा जाता. अधपके या भुने अन्न को ‘होला’ कहा जाता था, जिससे ‘होलिकोत्सव’ और आगे चलकर ‘होली’ शब्द का विकास माना जाता है. धीरे-धीरे इसमें पंचांग, ऋतु परिवर्तन और ज्योतिषीय मान्यताएं जुड़ती गईं. वसंत के आगमन के साथ प्रकृति के नवजीवन ने इस उत्सव को और अधिक रंगीन बना दिया. धूल-मिट्टी से खेली जाने वाली धुलैंडी की परंपरा को भी स्वास्थ्य और त्वचा उपचार से जोड़ा जाता है, जिससे यह पर्व जनसामान्य के जीवन का हिस्सा बनता गया.

इतिहास की दृष्टि से देखें तो भीमबेटका, अजंता गुफाएं और एलोरा गुफाएं जैसे स्थलों के शैलचित्रों में उत्सवधर्मिता और रंगों के प्रयोग के संकेत मिलते हैं. इससे स्पष्ट होता है कि भारतीय समाज केवल तप और साधना तक सीमित नहीं था, बल्कि आनंद और रंगों की संस्कृति भी उसकी पहचान रही है.

‘मदनोत्सव’ की परंपरा कैसे शुरू हुई? 

वसंत को प्रेम और जीवनोत्सव का समय माना गया. इसी से ‘मदनोत्सव’ की परंपरा विकसित हुई, जिसमें कामदेव और रति की उपासना की जाती थी. संस्कृत साहित्य में कालिदास की कृति ऋतुसंहार और भवभूति के नाटक मालती माधव में इस उत्सव का उल्लेख मिलता है. फूलों की वर्षा, शोभायात्राएं और प्रेमाभिव्यक्ति इस पर्व के प्रमुख आयाम थे. संभव है कि यही परंपराएं आगे चलकर रंगों की होली में रूपांतरित हो गईं.

मध्यकाल में होली ने सांप्रदायिक समन्वय का रूप लिया. फारसी विद्वान अलबरूनी ने भारत के उत्सवों का उल्लेख करते हुए होली का वर्णन किया. सूफी कवि अमीर खुसरो ने भी होली के रंगों को अपने काव्य में पिरोया और इसे आध्यात्मिक प्रेम से जोड़ा. भक्ति आंदोलन के साथ राधा-कृष्ण की लीलाओं ने इस पर्व को और लोकप्रिय बनाया.

मुगल काल में होली शाही उत्सव

मुगल काल में भी होली शाही उत्सव बन गई. अकबर के जोधाबाई के साथ और जहांगीर के नूरजहां संग होली खेलने के उल्लेख मिलते हैं. शाहजहां के समय इसे ‘ईद-ए-गुलाबी’ और ‘आब-ए-पाशी’ कहा गया. अंतिम मुगल बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र भी वसंतोत्सव के अनुरागी थे. अवध के नवाब वाजिद अली शाह ने ‘होली की ठुमरी’ को लोकप्रिय बनाया, जिससे यह उत्सव संगीत और नृत्य के रंग में भी रंग गया.

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