आज देशभर में होली का उल्लास छाया हुआ है. यह रंगों का त्योहार हर वर्ष चैत्र माह के आगमन के आसपास मनाया जाता है, जब सर्दी का असर कम होने लगता है और मौसम बदलाव की ओर बढ़ता है. परंपरागत मान्यता है कि मकर संक्रांति के बाद का समय कई लोगों के लिए मानसिक सुस्ती, थकान या उदासी लेकर आता है. ऐसे में होली का उत्सव रंग, संगीत, नृत्य और मेल-मिलाप के जरिए मन की नकारात्मकता को दूर करने का अवसर देता है.
विशेषज्ञों का मानना है कि रंगों का मनोविज्ञान से गहरा संबंध होता है. अलग-अलग रंग मनोदशा को प्रभावित करते हैं और तनाव को कम करने में सहायक हो सकते हैं. गुलाल की खुशबू, ढोल की थाप और अपनों से गले मिलना रिश्तों में जमी कड़वाहट को कम करता है. यही कारण है कि होली को केवल एक धार्मिक पर्व ही नहीं, बल्कि सामाजिक एकता और मानसिक ऊर्जा का उत्सव भी कहा जाता है.
धार्मिक पंचांगों के अनुसार सुबह का समय रंग खेलने के लिए शुभ माना गया है. प्रचलित मान्यता है कि दिन की शुरुआत में वातावरण अपेक्षाकृत शुद्ध और सकारात्मक ऊर्जा से भरपूर होता है. इसलिए अधिकांश लोग सुबह 8 बजे के आसपास रंगों की शुरुआत करते हैं और दोपहर 12 या 1 बजे तक उत्सव को विराम देना उचित समझते हैं. दोपहर बाद अत्यधिक शोर-शराबा या लंबे समय तक रंग खेलना परंपरा के अनुरूप नहीं माना जाता. इसीलिए सलाह दी जाती है कि सुबह के समय उत्साहपूर्वक होली मनाकर दिन को शांतिपूर्वक आगे बढ़ाया जाए.
ज्योतिष शास्त्र में भी होली के रंगों को ग्रहों से जोड़ा गया है. माना जाता है कि अलग-अलग रंगों का प्रयोग ग्रहों के नकारात्मक प्रभाव को कम कर सकता है और जीवन में सकारात्मकता ला सकता है. हालांकि, जिनकी त्वचा संवेदनशील है उन्हें प्राकृतिक या हल्के रंगों का उपयोग करने की सलाह दी जाती है.
पौराणिक कथाओं के अनुसार, इसी दिन भगवान शिव द्वारा भस्म किए गए कामदेव का पुनर्जन्म हुआ था. वहीं एक अन्य मान्यता में यह भी कहा जाता है कि भगवान कृष्ण ने इसी अवसर पर पूतना का वध किया था. ब्रज क्षेत्र में कृष्ण के साथ फूलों और रंगों की होली खेली जाती है, जबकि वाराणसी में विशेष भस्म होली का आयोजन होता है और काशी विश्वनाथ मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना की जाती है. इस प्रकार होली आस्था, आनंद और सामाजिक समरसता का अनूठा संगम है. First Updated : Wednesday, 04 March 2026