पत्नी की शिकायत पर पति को राहत, ‘अप्राकृतिक संबंध’ का आरोप खारिज
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने पति के खिलाफ ‘अप्राकृतिक यौन संबंध’ (धारा 377) के आरोप रद्द करते हुए कहा कि विवाह के भीतर ऐसे मामलों में यह धारा लागू नहीं होती. हालांकि, दहेज प्रताड़ना, मारपीट और धमकी जैसे अन्य आरोपों पर ट्रायल जारी रहेगा.

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने भिंड जिले के एक विवाहित व्यक्ति के खिलाफ ‘अप्राकृतिक यौन संबंध’ (सेक्शन 377 IPC) के आरोपों को निरस्त कर दिया है. यह मामला उसकी पत्नी द्वारा दर्ज कराई गई शिकायत से जुड़ा था. अदालत ने स्पष्ट किया कि वर्तमान कानूनी व्यवस्था के तहत वैध विवाह के भीतर लगाए गए इस प्रकार के आरोपों पर सेक्शन 377 के तहत मुकदमा नहीं चलाया जा सकता.
न्यायमूर्ति मिलिंद रमेश फड़के ने क्या कहा?
न्यायमूर्ति मिलिंद रमेश फड़के ने एफआईआर और आरोपों को रद्द करने की याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि यदि पत्नी द्वारा लगाए गए जबरन ‘अप्राकृतिक कृत्यों’ के आरोपों को प्रथम दृष्टया सही भी मान लिया जाए, तब भी वे पति-पत्नी के संबंधों के दायरे में आते हैं. ऐसे में इन्हें भारतीय दंड संहिता की धारा 377 के तहत अपराध नहीं माना जा सकता.
अदालत ने अपने फैसले में यह भी उल्लेख किया कि वर्ष 2013 में कानून में हुए संशोधन के बाद धारा 375 (बलात्कार) की परिभाषा को व्यापक बनाया गया है, जिसमें ओरल और एनल संबंधों को भी शामिल किया गया है. इसके बावजूद कानून में एक अपवाद अब भी मौजूद है, जिसके अनुसार पति द्वारा अपनी पत्नी के साथ बनाए गए यौन संबंधों को बलात्कार की श्रेणी में नहीं रखा गया है.
इसी कानूनी स्थिति को ध्यान में रखते हुए अदालत ने कहा कि पति-पत्नी के बीच होने वाले ऐसे कृत्यों को धारा 377 के तहत नहीं लाया जा सकता. इसलिए आरोपी पति के खिलाफ इस धारा में लगाए गए आरोपों को खारिज कर दिया गया.
आरोपों को लेकर हस्तक्षेप करने से इनकार
हालांकि, अदालत ने मामले में अन्य आरोपों को लेकर हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया. दहेज प्रताड़ना, मारपीट और आपराधिक धमकी जैसे आरोपों को रिकॉर्ड में मौजूद साक्ष्यों के आधार पर विचारणीय माना गया है और इन पर ट्रायल के दौरान सुनवाई जारी रहेगी.
यह फैसला ऐसे समय में आया है जब ग्वालियर-चंबल क्षेत्र में वैवाहिक विवादों में धारा 377 का इस्तेमाल बढ़ता देखा जा रहा है. अधिकारियों के अनुसार, कई मामलों में इस धारा को दहेज और क्रूरता के आरोपों के साथ जोड़कर कानूनी दबाव बढ़ाने के लिए शामिल किया जाता है. हालांकि, अदालतें लगातार इस धारा की वैवाहिक मामलों में लागू होने की सीमा को स्पष्ट करती रही हैं.


