West Bengal Politics: भवानीपुर सीट कैसे बनी TMC का मजबूत गढ़

भवानीपुर विधानसभा सीट पश्चिम बंगाल की राजनीति का अहम प्रतीक बन चुकी है. कभी कांग्रेस का गढ़ रही यह सीट अब ममता बनर्जी का मजबूत किला मानी जाती है, जो राज्य में बदलते राजनीतिक समीकरणों और सत्ता के परिवर्तन की कहानी बयां करती है.

Yogita Pandey
Edited By: Yogita Pandey

भवानीपुर: पश्चिम बंगाल की राजनीति में भवानीपुर विधानसभा सीट का विशेष महत्व रहा है. यह सीट केवल एक चुनावी क्षेत्र नहीं, बल्कि राज्य की बदलती राजनीतिक तस्वीर का आईना मानी जाती है, जिसने कांग्रेस के प्रभुत्व से लेकर तृणमूल कांग्रेस (TMC) के उभार तक का सफर देखा है.

आज यह सीट मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का मजबूत राजनीतिक गढ़ मानी जाती है, लेकिन हमेशा ऐसा नहीं था. आजादी के बाद कई दशकों तक भवानीपुर कांग्रेस का अहम केंद्र रहा, जहां से कई दिग्गज नेताओं ने चुनाव जीता और अपनी पहचान बनाई.

कांग्रेस का मजबूत गढ़ रहा भवानीपुर

भवानीपुर सीट लंबे समय तक कांग्रेस के प्रभाव में रही. पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर रे ने यहां से चुनाव जीते, वहीं मीरा दत्ता गुप्ता और रथिन तालुकदार जैसे नेताओं ने भी इस सीट का प्रतिनिधित्व किया.

1969 में वामपंथियों ने थोड़े समय के लिए इस सीट पर कब्जा जमाया, जब इसका नाम बदलकर कालीघाट कर दिया गया था. CPI(M) नेता साधन गुप्ता ने उस समय जीत दर्ज की थी.

1972 में गायब हुई सीट, 2011 में वापसी

1972 में परिसीमन के बाद यह सीट चुनावी नक्शे से ही हट गई और करीब चार दशकों तक अस्तित्व में नहीं रही. 2011 में जब इसे दोबारा बहाल किया गया, तब राज्य की राजनीति में बड़ा बदलाव हो रहा था.

इसी दौर में ममता बनर्जी के नेतृत्व में TMC का उदय हुआ और वाम मोर्चा के 34 साल पुराने शासन का अंत हुआ.

TMC का उभार और ममता का किला

2011 के चुनाव में TMC ने सुब्रत बख्शी को मैदान में उतारा, जिन्होंने 64% से अधिक वोट पाकर बड़ी जीत हासिल की. इसके बाद बख्शी ने सीट छोड़ दी और ममता बनर्जी ने उपचुनाव जीतकर विधानसभा में प्रवेश किया.

उपचुनाव में ममता बनर्जी को करीब 77% वोट मिले और उन्होंने अपने प्रतिद्वंदी को 54,000 से ज्यादा वोटों से हराया. तभी से भवानीपुर TMC का अजेय गढ़ बना हुआ है.

चुनावी मुकाबले और लगातार जीत

2016 में कांग्रेस और वाम दलों के गठबंधन ने ममता बनर्जी के खिलाफ दीपा दासमुंशी को उतारा, लेकिन ममता ने आसानी से जीत दर्ज की.

2021 में ममता बनर्जी नंदीग्राम से चुनाव लड़ीं, जबकि भवानीपुर से शोभनदेव चट्टोपाध्याय मैदान में थे. बाद में उपचुनाव में ममता ने BJP की प्रियंका टिबरेवाल को 58,000 से ज्यादा वोटों से हराया और अपनी पकड़ और मजबूत की.

सामाजिक संरचना और राजनीतिक असर

भवानीपुर क्षेत्र कोलकाता नगर निगम के वार्डों से मिलकर बना है, जहां बंगाली मध्यम वर्ग, हिंदी भाषी व्यापारी और मुस्लिम समुदाय का मिश्रण है.

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह विविधता ममता बनर्जी की राजनीति को मजबूती देती रही है.

विश्लेषक विश्वनाथ चक्रवर्ती के अनुसार, "भवानीपुर दक्षिण कोलकाता के मिले-जुले कल्चर को दिखाता है. ममता बनर्जी ने यहां लोगों से ऐसा निजी राजनीतिक जुड़ाव बनाया है जो सभी समुदायों को जोड़ता है."

2026 चुनाव से पहले बढ़ी सियासी गर्मी

2026 विधानसभा चुनाव से पहले भवानीपुर एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है. माना जा रहा है कि ममता बनर्जी यहां से चुनाव लड़ सकती हैं, जबकि BJP इस सीट पर मजबूत चुनौती देने की तैयारी में है.

विश्लेषकों का कहना है कि यह मुकाबला केवल एक सीट का नहीं, बल्कि पश्चिम बंगाल की राजनीति की दिशा तय करने वाला हो सकता है.

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