नई दिल्ली: आजकल के कॉर्पोरेट जगत में 'वर्क-लाइफ बैलेंस' और कर्मचारियों के अधिकारों को लेकर लगातार बहस छिड़ी रहती है. अक्सर देखा जाता है कि बीमारी की स्थिति में भी कर्मचारियों को आराम करने से ज्यादा इस बात की चिंता सताती है कि वे अपनी बीमारी का सबूत कंपनी के सामने कैसे पेश करें. हाल ही में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक ऐसा ही मामला सामने आया है, जिसने इंटरनेट जगत को दो गुटों में बांट दिया है. यह पूरा विवाद एक Gen Z कर्मचारी और उसके बॉस के बीच हुई वॉट्सऐप बातचीत के स्क्रीनशॉट से शुरू हुआ. जिसे @WhateverVishal नाम के हैंडल से शेयर किया गया है.
कंपनी की पॉलिसी बनाम कर्मचारी का आत्मसम्मान
वायरल चैट के मुताबिक, कर्मचारी ने अपने मैनेजर को मैसेज कर जानकारी दी कि उसका बुखार बढ़ गया है, इसलिए वह ऑफिस आने की स्थिति में नहीं है. इस पर मैनेजर ने उसे डॉक्टर के पास जाने की सलाह दी. कर्मचारी ने जवाब में कहा कि उसने पैरासिटामोल ले ली है और जरूरत होने पर ही वह डॉक्टर के पास जाएगा. मामला तब बिगड़ा जब बॉस ने कंपनी के नियमों का हवाला देते हुए कहा, डायरेक्टर सर ने साफ कहा है कि जो भी बीमार हो, उससे मेडिकल सर्टिफिकेट जरूर लिया जाए.
मैं स्कूल का छात्र नहीं हूं
बॉस की इस मांग पर कर्मचारी भड़क गया और उसने बेहद तीखा जवाब दिया. कर्मचारी ने लिखा, मैं कोई स्कूल का छात्र नहीं हूं सर. मेरे पास 'सिक लीव' का कोटा बचा हुआ था और मैंने केवल उसी का इस्तेमाल किया है. उसने आगे तंज कसते हुए लिखा कि अगर डॉक्टर की पर्ची इतनी ही अनिवार्य है, तो वह डायरेक्टर सर से कहें कि वे खुद उसके नाम का प्रिस्क्रिप्शन लिख दें.
कर्मचारी ने क्या कहा
कर्मचारी ने साफ शब्दों में स्पष्ट किया कि उसके पास न तो कोई मेडिकल सर्टिफिकेट है और न ही स्कूल के दिनों की तरह माता-पिता द्वारा हस्ताक्षरित कोई लीव एप्लीकेशन. आखिरकार, उसने सख्त लहजे में लिखा कि वह अब आराम करने जा रहा है और किसी भी कॉल या मैसेज का जवाब नहीं देगा.
इंटरनेट पर छिड़ी नई बहस
इस चैट के स्क्रीनशॉट के वायरल होते ही वर्कप्लेस कल्चर और कर्मचारियों के अधिकारों को लेकर सोशल मीडिया पर एक बड़ी बहस शुरू हो गई है.
कर्मचारियों के समर्थक
कई नेटिजन्स का तर्क है कि जब कंपनियां साल में एक निश्चित संख्या में सिक लीव देती हैं, तो उन्हें अपने कर्मचारियों पर भरोसा करना चाहिए. हल्के बुखार या सर्दी-खांसी के लिए जबरन डॉक्टर के पास जाना और पर्ची लाना प्राइवेसी और आत्मसम्मान के खिलाफ है.
कंपनियों के समर्थक
दूसरी तरफ, कुछ लोगों का मानना है कि कई बार कर्मचारी छुट्टियों का गलत फायदा उठाते हैं, इसलिए कंपनियों को नियमों में सख्ती बरतनी पड़ती है. हालांकि, इस वर्ग के लोगों ने भी माना कि कर्मचारी का अपने मैनेजर से बात करने का तरीका थोड़ा ज्यादा आक्रामक और अशिष्ट था. यह घटना दर्शाती है कि आधुनिक कॉर्पोरेट कल्चर में अब युवा कर्मचारी पारंपरिक और कड़े नियमों के सामने झुकने को तैयार नहीं हैं. First Updated : Thursday, 02 July 2026