सुवेंदु अधिकारी किस जाति के हैं और 55 की उम्र में भी क्यों हैं कुंवारे?

सुवेंदु अधिकारी का राजनीतिक सफर बंगाल की राजनीति के सबसे बड़े बदलावों में गिना जाता है. ममता बनर्जी के करीबी सहयोगी से लेकर भारतीय जनता पार्टी के प्रमुख चेहरे बनने तक, उनकी रणनीति ने राज्य की राजनीति की दिशा बदल दी.

Shraddha Mishra

नई दिल्ली: पश्चिम बंगाल की राजनीति में अगर किसी नेता ने पिछले कुछ वर्षों में सबसे ज्यादा सुर्खियां बटोरी हैं, तो वह हैं सुवेंदु अधिकारी. कभी ममता बनर्जी के सबसे भरोसेमंद सहयोगियों में गिने जाने वाले सुवेंदु आज उनके सबसे बड़े राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी बन चुके हैं. बंगाल में भारतीय जनता पार्टी की बढ़ती ताकत के पीछे जिन चेहरों का सबसे ज्यादा योगदान माना जाता है, उनमें सुवेंदु अधिकारी सबसे आगे दिखाई देते हैं. नंदीग्राम आंदोलन से लेकर ममता बनर्जी के गढ़ में उन्हें चुनौती देने तक, सुवेंदु का राजनीतिक सफर संघर्ष, रणनीति और बगावत से भरा रहा है.

अविवाहित हैं सुवेंदु अधिकारी

सुवेंदु अधिकारी का जन्म 15 दिसंबर 1970 को पूर्वी मेदिनीपुर जिले के कांथी में महिष्य समुदाय में हुआ था. उनका परिवार लंबे समय से बंगाल की राजनीति में सक्रिय रहा है. उनके पिता शिशिर अधिकारी राज्य की राजनीति के बड़े और प्रभावशाली नेताओं में गिने जाते रहे हैं. घर का माहौल राजनीतिक होने के कारण सुवेंदु अधिकारी की रुचि भी शुरुआती दिनों से राजनीति की ओर रही. 

उन्होंने 1989 में कांग्रेस की छात्र इकाई से अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत की. उस समय बंगाल में वामपंथी छात्र संगठनों का मजबूत प्रभाव था, ऐसे में विपक्षी राजनीति में अपनी जगह बनाना आसान नहीं था. 1995 में कांथी नगरपालिका से पार्षद चुने जाने के बाद उन्होंने स्थानीय राजनीति में अपनी मजबूत पहचान बनानी शुरू की.

ममता बनर्जी के साथ शुरू हुआ नया अध्याय

जब 1998 में अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस की स्थापना हुई, तब सुवेंदु अधिकारी अपने परिवार के साथ ममता बनर्जी के साथ जुड़ गए. धीरे-धीरे उन्होंने पार्टी संगठन और जमीनी राजनीति में खुद को मजबूत नेता के रूप में स्थापित कर लिया. उनकी पहचान केवल भाषण देने वाले नेता की नहीं थी, बल्कि ऐसे नेता की थी जो सीधे जनता के बीच जाकर काम करता था. इसी वजह से पार्टी के कार्यकर्ताओं और आम लोगों के बीच उनकी पकड़ लगातार मजबूत होती गई.

नंदीग्राम आंदोलन ने बदली राजनीतिक तस्वीर

सुवेंदु अधिकारी के राजनीतिक जीवन का सबसे अहम मोड़ साल 2007 का नंदीग्राम आंदोलन माना जाता है. उस समय वाम मोर्चा सरकार ने रासायनिक परियोजना के लिए किसानों की जमीन लेने का फैसला किया था. इस फैसले के खिलाफ गांवों में भारी विरोध शुरू हुआ. हालांकि आंदोलन का बड़ा चेहरा ममता बनर्जी थीं, लेकिन जमीन पर आंदोलन को संगठित करने और लोगों को एकजुट रखने का काम सुवेंदु अधिकारी कर रहे थे. 

सुवेंदु अधिकारी ने गांव-गांव जाकर लोगों को साथ जोड़ा और “भूमि उच्छेद प्रतिरोध कमेटी” बनाई. उनकी खासियत यह थी कि वे केवल मंच से भाषण देने तक सीमित नहीं रहते थे. वे गांवों में रुकते, किसानों से सीधे बात करते और आंदोलन को मजबूत बनाने में जुटे रहते. 14 मार्च 2007 की पुलिस फायरिंग के बाद भी उन्होंने पीछे हटने के बजाय आंदोलन को और मजबूती दी. राजनीतिक जानकार मानते हैं कि नंदीग्राम आंदोलन ने ही बंगाल में वामपंथी शासन की नींव हिला दी, जिसका असर 2011 के चुनाव में साफ दिखाई दिया.

ममता सरकार में बने मजबूत मंत्री

तृणमूल कांग्रेस की जीत के बाद सुवेंदु अधिकारी का राजनीतिक कद लगातार बढ़ता गया. उन्होंने 2009 और 2014 के लोकसभा चुनाव में तमलुक सीट से जीत दर्ज कर अपनी मजबूत पकड़ दिखाई. ममता बनर्जी ने उन्हें राज्य सरकार में परिवहन और सिंचाई जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालयों की जिम्मेदारी सौंपी. इन विभागों के जरिए उनका प्रशासनिक प्रभाव भी काफी मजबूत हो गया. उन्होंने उन इलाकों में भी पार्टी को मजबूत किया, जहां पहले विपक्ष का दबदबा माना जाता था. यही वजह थी कि पार्टी के भीतर उन्हें “दादा” के नाम से पहचान मिलने लगी.

पार्टी के भीतर बढ़ी नाराजगी

2019 के लोकसभा चुनाव के बाद तृणमूल कांग्रेस के भीतर हालात बदलने लगे. भारतीय जनता पार्टी के बेहतर प्रदर्शन ने पार्टी नेतृत्व की चिंता बढ़ा दी. इसी दौरान चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर की एंट्री हुई और पार्टी में नए तरीके से काम शुरू हुआ.
बताया जाता है कि इसी समय सुवेंदु अधिकारी खुद को पार्टी में अलग-थलग महसूस करने लगे. उन्हें लगने लगा कि पुराने नेताओं और जमीनी कार्यकर्ताओं की भूमिका कम की जा रही है. यह नाराजगी धीरे-धीरे खुलकर सामने आई और आखिरकार नवंबर 2020 में उन्होंने मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया. इससे तृणमूल कांग्रेस के भीतर हलचल तेज हो गई.

भारतीय जनता पार्टी में शामिल होकर बदला राजनीतिक समीकरण

दिसंबर 2020 में सुवेंदु अधिकारी ने तृणमूल कांग्रेस और विधायक पद दोनों छोड़ दिए. इसके बाद उन्होंने अमित शाह की मौजूदगी में भारतीय जनता पार्टी का दामन थाम लिया. उनका भारतीय जनता पार्टी में शामिल होना बंगाल की राजनीति का बड़ा मोड़ माना गया. पार्टी को राज्य में एक ऐसा चेहरा मिल गया, जो तृणमूल कांग्रेस की रणनीति और संगठन दोनों को करीब से समझता था. तृणमूल कांग्रेस ने उन पर केंद्रीय एजेंसियों के दबाव में पार्टी छोड़ने का आरोप लगाया, जबकि सुवेंदु अधिकारी ने पार्टी को “प्राइवेट लिमिटेड कंपनी” बताते हुए अपनी नाराजगी जाहिर की.

नंदीग्राम में ममता बनर्जी को हराकर बने बड़ा चेहरा

2021 के विधानसभा चुनाव में ममता बनर्जी ने भवानीपुर छोड़कर नंदीग्राम से चुनाव लड़ने का फैसला किया. यह मुकाबला पूरे देश की नजरों में था. इस हाई प्रोफाइल चुनाव में सुवेंदु अधिकारी ने ममता बनर्जी को हराकर बड़ा राजनीतिक संदेश दिया. इस जीत ने उन्हें रातों-रात भारतीय जनता पार्टी का सबसे बड़ा चेहरा बना दिया. बाद में उन्हें विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष की जिम्मेदारी भी सौंपी गई. आज सुवेंदु अधिकारी पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी की राजनीति का सबसे अहम चेहरा माने जाते हैं. ममता सरकार के खिलाफ लगातार आक्रामक रुख अपनाने वाले सुवेंदु खुद को बंगाल में सत्ता परिवर्तन की लड़ाई का सबसे बड़ा योद्धा माना जा रहा हैं.

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