भारत बना दुनिया का नया मैन्यूफैक्चरिंग हब, लेकिन चीन के एक फैसले ने बढ़ा दी चिंता

कोरोना महामारी के बाद वैश्विक पटल पर एक बड़ा बदलाव देखा गया. दुनिया भर की दिग्गज कंपनियों ने 'चीन+1' की रणनीति अपनाई, जिसमें भारत सबसे मजबूत विकल्प बनकर उभरा.

Nidhi Jha
Edited By: Nidhi Jha

नई दिल्ली: कोरोना महामारी के बाद वैश्विक पटल पर एक बड़ा बदलाव देखा गया. दुनिया भर की दिग्गज कंपनियों ने 'चीन+1' की रणनीति अपनाई, जिसमें भारत सबसे मजबूत विकल्प बनकर उभरा. एप्पल जैसी वैश्विक तकनीकी दिग्गज ने भारत में अपना उत्पादन बढ़ाया, सेमीकंडक्टर प्लांट्स की नीतियां आई और देश के इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात ने एक अभूतपूर्व छलांग लगाई.

इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात

साल 2015 में जो इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात महज 8.6 अरब डॉलर था, वह साल 2025 में बढ़कर 47 अरब डॉलर के सर्वकालिक उच्च स्तर पर पहुंच गया. इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने तो साल 2026 के अंत तक इस आंकड़े को 120 अरब डॉलर तक पहुंचाने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा है.

मैन्यूफैक्चरिंग हब

लेकिन इस चमकते आंकड़ों के पीछे एक कड़वी सच्चाई यह भी है कि जैसे-जैसे भारत असेंबलिंग और मैन्यूफैक्चरिंग हब बनने की ओर बढ़ रहा है, वैसे-वैसे कच्चे माल और कंपोनेंट्स के लिए उसकी चीनी सप्लाई चेन्स पर निर्भरता भी जगजाहिर हो रही है. इसी बीच चीन ने कुछ ऐसे कड़े कदम उठाए हैं, जिसने भारतीय नीति निर्माताओं और उद्योग जगत की रातों की नींद उड़ा दी है.

 भारत की चिंता

बीजिंग ने हाल ही में अपने नए 'स्टेट काउंसिल डिक्री 834 और 835' को लागू किया है. ये नए नियम सीधे तौर पर क्रिटिकल मिनरल्स, रेयर अर्थ मैटेरियल्स और एडवांस टेक्नोलॉजी मैन्यूफैक्चरिंग से जुड़े सामानों के निर्यात को प्रतिबंधित या नियंत्रित करते हैं. चीन के इस फैसले ने भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स और ऑटोमोटिव क्षेत्रों में एक गहरी चिंता पैदा कर दी है.

योजनाओं में बड़ी बाधा

भारतीय उद्योग जगत के दिग्गजों ने चेतावनी दी है कि महत्वपूर्ण मशीनरी और जरूरी कंपोनेंट्स पर चीन का यह प्रतिबंध भारत के कारखानों के विस्तार की योजनाओं में बड़ी बाधा बन सकता है. इससे न केवल विदेशी निवेश में देरी हो सकती है बल्कि उत्पादन की गति भी धीमी पड़ सकती है.

चीनी सप्लायर्स

इस संकट को भांपते हुए प्रमुख इलेक्ट्रॉनिक्स कंपनियों ने सप्लाई चेन पर पड़ने वाले प्रभाव को समझने के लिए अपने चीनी सप्लायर्स के साथ बातचीत शुरू कर दी है साथ ही संभावित नुकसान से बचने के लिए आईटी मंत्रालय को भी आगाह किया है.

सही समय पर गलत झटका

चीन का यह प्रतिबंध ऐसे समय में आया है जब भारत अपने देश में स्थानीय स्तर पर पुर्जे बनाने की कोशिश कर रहा है. स्मार्टफोन से लेकर इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) तक, आधुनिक मैन्यूफैक्चरिंग आज भी काफी हद तक चीनी मशीनरी और इलेक्ट्रॉनिक्स पार्ट्स पर टिकी हुई है. उदाहरण के लिए, वित्त वर्ष 2025 में भारत के कुल ऑटो कंपोनेंट आयात का लगभग 26 प्रतिशत हिस्सा अकेले चीन से आया था, जिसमें से ज्यादातर हिस्से हाई-वैल्यू वाले इलेक्ट्रॉनिक्स थे.

'कार्स अनलिमिटेड'

ऑटोमोटिव सेक्टर की इस गंभीर स्थिति पर 'कार्स अनलिमिटेड' के संस्थापक मुस्तफा सिंगापुरवाला कहते हैं भारत के ऑटोमोटिव जगत की असली कहानी अब शोरूम में नहीं, बल्कि सप्लाई चेन्स के भीतर लिखी जा रही है. आज की एक आधुनिक कार को तैयार करने में लगभग 3,000 चिप्स तक की जरूरत होती है.

नए मॉडल्स की लॉन्चिंग

ऐसे में अगर पीछे से आपूर्ति कम होती है तो सिर्फ गाड़ियों की कीमतें ही नहीं बढ़ेंगी बल्कि नए मॉडल्स की लॉन्चिंग में देरी होगी और ग्राहकों का वेटिंग पीरियड भी लंबा हो जाएगा. सिंगापुरवाला ने एक और बड़े खतरे की तरफ इशारा करते हुए कहा कि बीजिंग के नए फरमान इतने सख्त हैं कि यदि कोई चीनी कंपनी या उसके अधिकारी अपने उत्पादन को चीन से बाहर जैसे भारत ट्रांसफर करने की कोशिश करते हैं तो चीनी नियामक उन्हें दंडित कर सकते हैं. 

आत्मनिर्भरता की तरफ बढ़ने का अंतिम मौका

उद्योग जगत का एक बड़ा हिस्सा इसे संकट के साथ-साथ भारत के लिए एक बड़े टर्निंग पॉइंट के रूप में भी देख रहा है. 'एलईडीएक्स टेक्नोलॉजी' और 'एक्सट्रीम मीडिया' के प्रबंध निदेशक संकेत रामभिया का मानना है कि किसी एक देश पर मैन्यूफैक्चरिंग के लिए अत्यधिक निर्भर रहना अब बिल्कुल भी टिकाऊ नहीं है. उनके अनुसार भारत अब केवल 'असेंबली' के भरोसे विकास नहीं कर सकता बल्कि उसे अपने देश के भीतर ही गहरे कंपोनेंट इको-सिस्टम और दीर्घकालिक तकनीकी क्षमताओं को विकसित करना होगा.

घरेलू एक्टिव एलईडी

रामभिया बताते हैं कि भारत में घरेलू एक्टिव एलईडी डिस्प्ले का बाजार वर्तमान में लगभग 2,000 करोड़ रुपये का है और यह सालाना 15-20 प्रतिशत की तेज रफ्तार से बढ़ रहा है. चूंकि दुनिया भर की मूल उपकरण निर्माता (OEM) कंपनियां चीन का विकल्प ढूंढ रही हैं इसलिए भारत के पास एक विश्वसनीय वैश्विक मैन्यूफैक्चरिंग पार्टनर बनने का यह सबसे सुनहरा मौका है. इसी सोच के साथ उनकी कंपनी ने गुजरात में 10,000 वर्ग मीटर की एक एक्टिव एलईडी डिस्प्ले मैन्यूफैक्चरिंग यूनिट का विस्तार भी किया है.

सरकार का मास्टर प्लान

चीन के इस चक्रव्यूह को तोड़ने के लिए भारत सरकार ने भी अपनी तैयारी तेज कर दी है. इसके तहत औद्योगिक बुनियादी ढांचे को मजबूत करने के लिए एक बड़ी योजना की शुरुआत की गई है. सरकार 33,660 करोड़ रुपये के भारी-भरकम बजट के साथ 'भारत औद्योगिक विकास योजना' (भव्या) लेकर आई है.

औद्योगिक पार्कों को चालू करने का लक्ष्य

इस भव्या योजना के अंतर्गत अगले तीन वर्षों के भीतर देश में 50 अत्याधुनिक औद्योगिक पार्कों को चालू करने का लक्ष्य रखा गया है. भारत की यह रणनीति भविष्य में कच्चे माल के लिए घरेलू आत्मनिर्भरता पैदा करेगी. वैश्विक विश्लेषकों का मानना है कि जमीन पर इस इको-सिस्टम को पूरी तरह से तैयार होने और चीन को पछाड़ने में अभी कुछ साल का समय जरूर लगेगा.

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