रूस से मिलने वाले तेल पर अमेरिका की छूट समाप्त, अब भारत क्या करेगा?
भारत को अमेरिकी छूट खत्म होने और होर्मुज स्ट्रेट में बढ़ते तनाव के कारण तेल आपूर्ति और बढ़ती कीमतों की दोहरी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है. विशेषज्ञों का मानना है कि यदि संकट लंबा चला तो पेट्रोल-डीजल, एलपीजी और रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतों पर सीधा असर पड़ सकता है.

नई दिल्ली: वैश्विक ऊर्जा बाजार में बढ़ते तनाव के बीच भारत के सामने तेल आपूर्ति और ईंधन कीमतों को लेकर नई चुनौती खड़ी हो गई है. लंबे समय तक रियायती रूसी कच्चे तेल के सहारे अपने आयात बिल और महंगाई को नियंत्रित रखने वाला भारत अब कठिन परिस्थितियों का सामना कर सकता है. इसकी बड़ी वजह अमेरिकी प्रशासन द्वारा रूसी समुद्री कच्चे तेल पर दी गई अस्थायी छूट को समाप्त करना है. इस फैसले के बाद भारतीय रिफाइनरियों के लिए रूसी तेल खरीदना पहले की तुलना में अधिक जोखिम भरा हो गया है.
होर्मुज स्ट्रेट क्षेत्र में बढ़ती अस्थिरता
स्थिति इसलिए और गंभीर मानी जा रही है क्योंकि इसी समय मध्य पूर्व में जारी संघर्ष के कारण होर्मुज स्ट्रेट क्षेत्र में अस्थिरता बढ़ गई है. यह दुनिया के सबसे अहम तेल परिवहन मार्गों में शामिल है. तनाव के चलते तेल टैंकरों की आवाजाही प्रभावित हुई है और बीमा लागत भी तेजी से बढ़ी है. इसका असर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों पर साफ दिखाई दे रहा है, जहां दाम 72 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर 100 डॉलर से ऊपर पहुंच चुके हैं.
भारत अपनी जरूरत का 85 प्रतिशत से अधिक कच्चा तेल आयात करता है. ऐसे में तेल कीमतों में वृद्धि का सीधा असर घरेलू अर्थव्यवस्था पर पड़ता है. यूक्रेन युद्ध के बाद जब पश्चिमी देशों ने रूस से दूरी बनाई थी, तब भारत ने बड़े पैमाने पर सस्ता रूसी तेल खरीदना शुरू किया. इससे देश को महंगाई नियंत्रित रखने और तेल आयात लागत घटाने में मदद मिली. धीरे-धीरे रूस भारत का सबसे बड़ा तेल आपूर्तिकर्ता बन गया.
हालांकि अब अमेरिकी प्रतिबंधों में छूट खत्म होने से भारतीय कंपनियों को दोबारा मध्य पूर्वी देशों की ओर रुख करना पड़ सकता है. लेकिन खाड़ी क्षेत्र में जारी तनाव के कारण वहां से स्थिर और सस्ती आपूर्ति की कोई गारंटी नहीं है. विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह संकट लंबा चला तो भारत का तेल आयात बिल तेजी से बढ़ सकता है. इसका असर पेट्रोल-डीजल, एलपीजी, हवाई किराए, ट्रांसपोर्ट और खाद्य वस्तुओं की कीमतों पर भी दिखाई दे सकता है.
सरकार के सामने क्या चुनौती?
सरकार के सामने फिलहाल कठिन संतुलन बनाने की चुनौती है. एक ओर उपभोक्ताओं को राहत देने का दबाव है, वहीं दूसरी ओर सरकारी वित्तीय स्थिति पर बोझ बढ़ने का खतरा भी बना हुआ है. कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि यदि वैश्विक संकट और गहराया तो सरकार को ईंधन बचत से जुड़े पुराने उपायों पर भी विचार करना पड़ सकता है, जैसे गैर-जरूरी यात्राओं में कमी या ऊर्जा खपत घटाने के कदम.
ऊर्जा क्षेत्र से जुड़े जानकारों का मानना है कि मौजूदा हालात केवल तेल खरीदने की चुनौती नहीं हैं, बल्कि सुरक्षित, किफायती और राजनीतिक दबावों से बचते हुए आपूर्ति सुनिश्चित करने की परीक्षा भी हैं. ऐसे में भारत को खाड़ी क्षेत्र की अस्थिरता और संयुक्त राज्य अमेरिका के बढ़ते दबाव के बीच बेहद सावधानी से रणनीति बनानी होगी.


