सुरों की मलिका सुमन कल्याणपुर का हुआ निधन, 89 की उम्र में ली अंतिम सांस
संगीत जगत की सबसे दिग्गज प्लेबैक सिंगर सुमन कल्याणपुर अब हमारे बीच नहीं रहीं. उन्होंने 89 साल की उम्र में आखिरी सांस ली. ये खबर सुनते ही संगीत जगत में शोक का लहर छा गया है.

नई दिल्ली: भारतीय संगीत जगत के सुनहरे दौर की सबसे अनमोल और दिग्गज प्लेबैक सिंगर सुमन कल्याणपुर अब हमारे बीच नहीं रहीं. रविवार शाम मुंबई के लोखंडवाला स्थित अपने आवास पर उन्होंने 89 वर्ष की आयु में आखिरी सांस ली.
स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं
पारिवारिक मित्रों के अनुसार वह पिछले कुछ समय से बढ़ती उम्र से जुड़ी स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से जूझ रही थीं. उनके निधन की खबर फैलते ही संगीत, सिनेमा और राजनीति जगत में शोक की लहर दौड़ गई है. आम श्रोताओं से लेकर देश की बड़ी हस्तियों तक सभी इस सुरीली आवाज के शांत होने पर गहरा दुख व्यक्त कर रहे हैं.
800 से अधिक फिल्मो में गाया गाना
सुमन कल्याणपुर का जन्म 28 जनवरी 1937 को अविभाजित भारत के भवानीपुर में हुआ था. बचपन से ही संगीत के प्रति गहरा लगाव रखने वाली सुमन ने आगे चलकर भारतीय फिल्म संगीत में अपनी एक विशिष्ट पहचान बनाई. 1960 और 1970 के दशक में जब लता मंगेशकर का संगीत जगत पर दबदबा था. उस दौर में भी सुमन कल्याणपुर ने अपनी जादुई और मधुर आवाज के दम पर एक अलग मुकाम हासिल किया. उन्होंने अपने पूरे करियर में 800 से अधिक फिल्मी गानों को अपनी अनूठी आवाज से सजाया.
11 से अधिक भाषाओं में गाए कालजयी गीत
सुमन कल्याणपुर की प्रतिभा केवल हिंदी सिनेमा तक सीमित नहीं थी. उन्होंने देश की विविध संस्कृतियों को अपने सुरों में पिरोया और हिंदी के अलावा मराठी, असमिया, गुजराती, कन्नड़, मैथिली, भोजपुरी, राजस्थानी, बंगाली, ओडिया और पंजाबी सहित 11 से अधिक क्षेत्रीय भाषाओं में ढेरों गीत रिकॉर्ड किए. कला और संगीत के क्षेत्र में उनके इसी अद्वितीय और अभूतपूर्व योगदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मानों में से एक 'पद्म भूषण' से भी नवाजा था.
मोहम्मद रफी के साथ जुगलबंदी
अपने लंबे फिल्मी सफर में उन्होंने मोहम्मद रफी के साथ कई यादगार और सुपरहिट गीत गाए. उनके कुछ सबसे लोकप्रिय गानों में 'आजकल तेरे मेरे प्यार के चर्चे', 'ना ना करते प्यार तुम्हीं से', 'तुमने पुकारा और हम चले आए' और 'मेरे महबूब ना जा' शामिल हैं. जो आज भी संगीत प्रेमियों की जुबान पर रहते हैं. गंभीर गानों में फिल्म 'शगुन' का 'बुझा दिए हैं खुद अपने हाथों' और फिल्म 'दिल एक मंदिर है' का शीर्षक गीत आज भी लोगों को भावुक कर देता है.
महिला प्लेबैक सिंगर का पुरस्कार
वर्ष 1974 में आई फिल्म 'रेशम की डोरी' के लिए गाया उनका भावुक भाई-बहन का गीत 'बहना ने भाई की कलाई से' देश का एक कल्ट गीत बन गया, जिसके लिए उन्हें 1975 में फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ महिला प्लेबैक सिंगर के पुरस्कार के लिए नामांकित भी किया गया था. उनका जाना भारतीय संगीत के एक युग का अंत है.


