UGC के नए नियम ने शिक्षा में नई अदालत बनाई, जहां अपील नहीं और जवाबदेही भी नहीं
UGC के नए नियमों ने उसकी भूमिका बदल दी है। अब वह नीति तय करने वाली संस्था नहीं, बल्कि सज़ा तय करने वाली ताकत बनती दिख रही है। यही कारण है कि सवाल उठ रहे हैं।

UGC का असली काम नीति बनाना और मानक तय करना है। वही उसका संवैधानिक दायरा है। लेकिन नए नियम इस दायरे को तोड़ते दिखते हैं। अब UGC नियम बनाकर खुद ही उसका फैसला करने लगी है। वह तय कर रही है कि शिकायत कैसे चलेगी। यही नहीं, नतीजा भी वही तय करती है। यह बदलाव चुपचाप हुआ। किसी बड़े संवाद के बिना हुआ।
किसने दिया न्याय करने का अधिकार?
नए नियमों में यह साफ नहीं कि शिकायत कौन करेगा। यह भी तय नहीं कि जाँच कौन करेगा। झूठ और सच तय करने की जिम्मेदारी किसकी होगी, इसका जवाब नहीं मिलता। सज़ा कितनी होगी, इसका भी पैमाना नहीं है। ऐसे में सवाल उठता है कि यह अधिकार आया कहां से। क्या किसी कानून ने UGC को अदालत बना दिया।
कहाँ है जवाबदेही की सीमा?
कानून में ताकत के साथ जवाबदेही चलती है। लेकिन यहां ताकत तो है, जवाबदेही नहीं दिखती। UGC के फैसलों पर न संसद की सीधी बहस है। न किसी स्थायी निगरानी की व्यवस्था दिखती है। हाईकोर्ट तक मामला पहुंचे, उससे पहले ही नुकसान हो जाता है। यही सबसे बड़ी चिंता है।
क्या बन रही है समानांतर अदालत?
जब कोई संस्था शिकायत सुने, जाँच कराए और सज़ा तय करे, तो वह अदालत जैसी हो जाती है। UGC के नए नियम उसी दिशा में जाते दिखते हैं। फर्क बस इतना है कि अदालत में अपील होती है। यहां अपील का रास्ता धुंधला है। प्रक्रिया साफ नहीं है। यही इसे खतरनाक बनाता है।
किस पर पड़ेगा सीधा असर?
इस व्यवस्था का असर सबसे पहले शिक्षक और छात्रों पर पड़ेगा। एक शिकायत से उनका भविष्य अटक सकता है। निलंबन आसान हो जाएगा। बहाली मुश्किल हो जाएगी। नाम खराब होना तय है। फैसला पलट भी जाए तो नुकसान वापस नहीं आता। यही डर शिक्षा के माहौल को बदल देगा।
क्यों बढ़ रहा है अविश्वास?
जब नियम साफ नहीं होते, तो भरोसा टूटता है। लोग मान लेते हैं कि फैसला पहले हो चुका है। जांच केवल औपचारिकता बन जाती है। यही कारण है कि संस्थानों में डर फैल रहा है। सवाल पूछने से लोग बच रहे हैं। असहमति कमजोर पड़ रही है। शिक्षा चुप होती जा रही है।
आगे समाधान का रास्ता क्या?
UGC को अपनी सीमा तय करनी होगी। नीति और न्याय के बीच फर्क साफ करना होगा। जांच की प्रक्रिया पारदर्शी बनानी होगी। जवाबदेही तय करनी होगी। अपील का स्पष्ट रास्ता देना होगा। तभी भरोसा लौटेगा। वरना सवाल यही रहेगा कि UGC को नागरिकों की नियति तय करने का हक किसने दिया।


