असम: बकरीद से पहले मस्जिद समितियों का बड़ा फैसला, CM हिमंत सरमा ने की तारीफ
बकरीद से पहले असम की कई मस्जिद समितियों ने ऐसा फैसला लिया है, जिसकी पूरे राज्य में चर्चा हो रही है. मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने भी इस कदम की सराहना की है, जबकि मामले ने राजनीतिक और सामाजिक बहस को तेज कर दिया.

नई दिल्ली: बकरीद से पहले असम से एक ऐसी खबर सामने आई है, जिसने पूरे राज्य में चर्चा का माहौल बना दिया है. राज्य के कई जिलों की मस्जिद समितियों ने स्वेच्छा से यह घोषणा की है कि इस बार ईद-उल-अजहा यानी बकरीद पर गाय की कुर्बानी नहीं दी जाएगी. इस फैसले को मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने सांप्रदायिक सौहार्द की दिशा में सकारात्मक कदम बताते हुए इसकी खुलकर सराहना की है. राज्य में इस निर्णय को सामाजिक समझदारी और आपसी सम्मान के उदाहरण के तौर पर देखा जा रहा है.
जानकारी के मुताबिक, असम के अलग-अलग जिलों में मस्जिद समितियों और स्थानीय धार्मिक संगठनों ने समुदाय से अपील की है कि बकरीद के मौके पर ऐसे जानवरों की कुर्बानी दी जाए, जिनसे किसी समुदाय की धार्मिक भावनाएं आहत न हों. समितियों ने कहा कि शांति और भाईचारे को बनाए रखना सभी की जिम्मेदारी है और इसी सोच के साथ यह निर्णय लिया गया है.
स्थानीय स्तर पर कई जगहों पर बैठकें भी आयोजित की गईं, जिनमें धार्मिक नेताओं और समुदाय के लोगों ने भाग लिया. इन बैठकों में यह बात सामने आई कि समाज में आपसी विश्वास और सौहार्द बनाए रखने के लिए संवेदनशील मुद्दों पर समझदारी से काम करना जरूरी है.
मुख्यमंत्री हिमंत सरमा ने की तारीफ
मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने इस फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि यह पूरी तरह से स्वैच्छिक कदम है और इससे समाज में सकारात्मक संदेश जाएगा. उन्होंने सोशल मीडिया पर कुछ खबरों की तस्वीरें साझा करते हुए लिखा कि ऐसी पहलें सामाजिक सद्भाव को मजबूत करती हैं और दूसरे क्षेत्रों को भी इससे प्रेरणा लेनी चाहिए. मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि कानून और सामाजिक जिम्मेदारी दोनों का पालन करना हर नागरिक का कर्तव्य है. उनके मुताबिक, जब समुदाय खुद आगे बढ़कर शांति बनाए रखने के लिए पहल करता है, तो इससे समाज में भरोसा बढ़ता है.
पूर्व विधायक की गिरफ्तारी से बढ़ा मामला
इस पूरे घटनाक्रम के बीच शनिवार को धुबरी के पूर्व विधायक अली अकबर मियां की गिरफ्तारी ने मामले को और चर्चा में ला दिया. पुलिस के अनुसार, उन पर सोशल मीडिया पर विवादित पोस्ट साझा करने का आरोप है. आरोप है कि पोस्ट में उन्होंने प्रशासन को चेतावनी दी थी और मुख्यमंत्री के खिलाफ भी आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल किया था. पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है. अधिकारियों का कहना है कि सोशल मीडिया पर किसी भी तरह की भड़काऊ या तनाव बढ़ाने वाली सामग्री पर सख्त कार्रवाई की जाएगी. प्रशासन फिलहाल पूरे मामले पर नजर बनाए हुए है ताकि त्योहार के दौरान शांति व्यवस्था बनी रहे.
असम मवेशी संरक्षण कानून का भी असर
राज्य में लागू असम मवेशी संरक्षण अधिनियम, 2021 को भी इस फैसले की एक बड़ी वजह माना जा रहा है. इस कानून के तहत मवेशियों के वध और उनके व्यापार को लेकर कई नियम तय किए गए हैं. बिना अनुमति पशु वध और अवैध परिवहन पर सख्त कार्रवाई का प्रावधान है. हालांकि राज्य में बीफ पर पूरी तरह प्रतिबंध नहीं है, लेकिन कानून के तहत कई सीमाएं निर्धारित की गई हैं. ऐसे में धार्मिक संगठनों ने कानून और सामाजिक संतुलन दोनों को ध्यान में रखते हुए यह फैसला लिया है.
सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल बनने की कोशिश
राजनीतिक और सामाजिक विश्लेषकों का मानना है कि इस फैसले से राज्य में शांति और भाईचारे का माहौल मजबूत हो सकता है. कई लोगों ने इसे संवेदनशील मुद्दों पर परिपक्व सोच का उदाहरण बताया है. वहीं सोशल मीडिया पर भी इस पहल को लेकर मिली-जुली प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं. फिलहाल प्रशासन त्योहार को शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न कराने की तैयारी में जुटा हुआ है. सुरक्षा एजेंसियों को अलर्ट पर रखा गया है और संवेदनशील इलाकों में अतिरिक्त निगरानी बढ़ा दी गई है.


