भारत के अंतरिक्ष यात्री शुभांशु शुक्ला की ऐतिहासिक वापसी, ISRO ने किए ₹550 करोड़ खर्च
Axiom-4 मिशन के तहत अंतरिक्ष में 18 दिन बिताने के बाद, भारतीय अंतरिक्ष यात्री शुभांशु शुक्ला और तीन अन्य अंतरिक्ष यात्री सोमवार को धरती पर लौटने के लिए रवाना होंगे. ISS पर उन्होंने कई महत्वपूर्ण वैज्ञानिक प्रयोग किए, जो भविष्य के अंतरिक्ष अभियानों के लिए उपयोगी साबित होंगे.

भारत के लिए अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में 2025 एक ऐतिहासिक साल बन गया है. भारतीय अंतरिक्ष यात्री शुभांशु शुक्ला ने अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) की सफल यात्रा पूरी की है. वह न केवल ISS पर पहुंचने वाले पहले भारतीय बने हैं, बल्कि 1984 में राकेश शर्मा के बाद अंतरिक्ष में जाने वाले दूसरे भारतीय भी हैं. यह मिशन भारत के लिए वैज्ञानिक और रणनीतिक दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है.
शुभांशु शुक्ला ने 18 दिन अंतरिक्ष में बिताए. ISS की तेज रफ्तार (28,000 किमी/घंटा) के कारण उन्होंने रोजाना 16 बार सूर्योदय और सूर्यास्त का अनुभव किया. यह अनुभव न केवल उनके लिए व्यक्तिगत रूप से रोमांचक था, बल्कि वैज्ञानिक रूप से भी बहुमूल्य रहा. ISRO के अनुसार, पृथ्वी पर लौटने के बाद शुक्ला एक 7 दिन के पुनर्वास कार्यक्रम से गुजरेंगे ताकि उनका शरीर दोबारा पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति के अनुकूल हो सके. यह प्रक्रिया एक फ्लाइट सर्जन की निगरानी में होगी.
ISRO का बड़ा निवेश
इस ऐतिहासिक मिशन के लिए ISRO ने लगभग ₹550 करोड़ का निवेश किया. यह कदम सीधे तौर पर भारत के मानव अंतरिक्ष उड़ान कार्यक्रम 'गगनयान' की तैयारी का हिस्सा है. गगनयान मिशन को 2027 में लॉन्च किया जाना है. शुभांशु शुक्ला की अंतरिक्ष यात्रा से मिले अनुभव, प्रशिक्षण और वैज्ञानिक जानकारी गगनयान की योजना और निष्पादन में महत्वपूर्ण योगदान देंगे.
वापसी की तैयारी और स्प्लैशडाउन
भारतीय समयानुसार सोमवार दोपहर 2:25 बजे, शुक्ला और तीन अन्य अंतरिक्ष यात्री स्पेसक्राफ्ट में सवार होंगे. वे स्पेससूट पहनकर जरूरी परीक्षणों के बाद ड्रैगन स्पेसक्राफ्ट से धरती की ओर लौटेंगे. यह स्पेसक्राफ्ट धीरे-धीरे अपनी गति कम करेगा और कैलिफोर्निया के तट पर 'स्प्लैशडाउन' करेगा. NASA के अनुसार, ड्रैगन स्पेसक्राफ्ट लगभग 263 किलोग्राम कार्गो के साथ लौटेगा, जिसमें वैज्ञानिक प्रयोगों का डेटा और NASA हार्डवेयर शामिल है.
ISS पर वैज्ञानिक प्रयोग
अपने प्रवास के दौरान शुक्ला ने विशेष रूप से माइक्रोएल्गी प्रयोग पर काम किया. उन्होंने ऐसे नमूने लगाए और संरक्षित किए जो भविष्य में गहरे अंतरिक्ष मिशनों के लिए भोजन, ऑक्सीजन और बायोफ्यूल का स्रोत बन सकते हैं. NASA के अनुसार, माइक्रोएल्गी की लचीलापन उन्हें अंतरिक्ष में दीर्घकालिक जीवन समर्थन के लिए उपयुक्त बनाती है.


