'भारत में मजदूर काम करने को तैयार नहीं', L&T चेयरमैन ने फिर खड़ा किया विवाद

सुब्रमण्यन ने यह भी कहा कि भारत को प्रवास की एक अजीबोगरीब समस्या का सामना करना पड़ रहा है. उन्होंने कहा कि L&T को 4 लाख कर्मचारियों की आवश्यकता है, लेकिन उसे 16 लाख लोगों की भर्ती करनी पड़ रही है.

Kamal Kumar Mishra

L&T Chairman: लार्सन एंड टुब्रो (L&T) के चेयरमैन एसएन सुब्रमण्यन एक बार फिर विवाद के केंद्र में हैं. इस बार उन्होंने मजदूरों के अपने गृह नगर नहीं छोड़ने पर टिप्पणी की है. उन्होंने कहा कि सरकारी योजनाओं की वजह से लोग अपना घर नहीं छोड़ रहे हैं. 'भारत में मजदूर काम करने के लिए तैयार नहीं हैं.' हाल ही में उन्होंने 90 घंटे कार्य सप्ताह की वकालत की थी, जिसके बाद उनकी जमकर आलोचना हुई थी. 

सुब्रमण्यन ने मंगलवार को चेन्नई में सीआईआई के मिस्टिक साउथ ग्लोबल लिंकेज समिट 2025 में बोलते हुए कहा कि निर्माण उद्योग के लिए श्रमिक मिलना मुश्किल है क्योंकि वे आराम की वजह से अपने गृहनगर से यात्रा करने में अनिच्छुक हैं. उन्होंने कहा कि मनरेगा, प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण और जन धन खातों जैसी योजनाओं से श्रमिक जुटाने पर असर पड़ सकता है.

श्रमिक अवसरों के लिए आगे बढ़ने को तैयार नहीं 

उन्होंने कहा, "श्रमिक अवसरों के लिए आगे बढ़ने को तैयार नहीं हैं. हो सकता है कि उनकी स्थानीय अर्थव्यवस्था अच्छी चल रही हो, हो सकता है कि यह विभिन्न सरकारी योजनाओं के कारण हो." उन्होंने कहा कि श्रमिकों की कमी से भारत के बुनियादी ढांचे के निर्माण पर असर पड़ेगा.

4 लाख की जगह 16 लाख कर्मियों की भर्ती

सुब्रमण्यन ने यह भी कहा कि भारत को प्रवास की एक अजीबोगरीब समस्या का सामना करना पड़ रहा है. उन्होंने कहा कि L&T को 4 लाख कर्मचारियों की आवश्यकता है, लेकिन उसे 16 लाख लोगों की भर्ती करनी पड़ रही है. उन्होंने मुद्रास्फीति के अनुरूप श्रमिकों के लिए वेतन में संशोधन की आवश्यकता पर भी जोर दिया, उन्होंने बताया कि मध्य पूर्व में श्रमिकों की संख्या भारत की तुलना में तीन से 3.5 गुना अधिक है.

सुब्रमण्यन पहले भी दे चुके हैं विवादित बयान

लार्सन एंड टूब्रो के चेयरमैन ने पिछले महीने कहा था कि वह चाहते हैं कि उनके कर्मचारी रविवार को भी काम करें. उन्होंने कहा था, "आप घर पर बैठकर क्या करते हैं? आप अपनी पत्नी को कितनी देर तक घूर सकते हैं? चलिए, ऑफिस जाइए और काम करना शुरू कर दीजिए." उन्होंने यह भी कहा था कि वह रविवार को भी काम करते हैं.

इस बहस में अदार पूनावाला, आनंद महिंद्रा और आईटीसी के संजीव पुरी जैसे कई उद्योग जगत के नेताओं ने उत्पादकता के लिए कार्य-जीवन संतुलन की आवश्यकता की वकालत की. यह मामला संसद तक तब पहुंचा जब सरकार ने पिछले सप्ताह संसद को बताया कि वह अधिकतम कार्य घंटों को बढ़ाकर 70 या 90 घंटे प्रति सप्ताह करने के किसी प्रस्ताव पर विचार नहीं कर रही है.

सप्ताह में 70-90 घंटे काम

सप्ताह में 70-90 घंटे काम करने के बारे में चर्चा के दौरान, पिछले शुक्रवार को बजट-पूर्व आर्थिक सर्वेक्षण में अध्ययनों का हवाला देते हुए कहा गया था कि सप्ताह में 60 घंटे से अधिक काम करने से स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है.

सर्वेक्षण में पाया गया कि अपने डेस्क पर लंबे समय तक बैठना मानसिक स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है, तथा जो व्यक्ति अपने डेस्क पर (प्रतिदिन) 12 या इससे अधिक घंटे बिताते हैं, उनका मानसिक स्वास्थ्य व्यथित या संघर्षशील होता है.

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