राहुल का ‘गद्दार दोस्त’ और बाजवा का बैंडबाजा, कांग्रेस खुद ही खोद रही अपनी सियासत की कब्र

पंजाब की सियासत में इस बार बारूद विपक्ष ने खुद बिछाया है। राहुल गांधी और प्रताप सिंह बाजवा के शब्दों ने सिर्फ विवाद नहीं पैदा किया, बल्कि यह शक मजबूत कर दिया कि कांग्रेस अब सरकार से कम और अपनी ही भाषा से ज्यादा हार रही है। सवाल यह नहीं कि किसने क्या कहा, सवाल यह है कि क्या पार्टी अपने ही बयानों से खुद को कमजोर कर रही है।

Lalit Sharma
Edited By: Lalit Sharma

राहुल गांधी देश की संसद में खड़े होकर “गद्दार” जैसा शब्द बोल देते हैं और शायद उन्हें अंदाज़ा भी नहीं होता कि पंजाब जैसी संवेदनशील जमीन पर यह शब्द सिर्फ बयान नहीं, बारूद की तरह गिरता है, क्योंकि यहां इतिहास सिर्फ किताबों में नहीं, लोगों की स्मृति में जिंदा रहता है और हर शब्द का वजन तौला जाता है। यह कोई छात्र राजनीति का मंच नहीं था, यह संसद थी जहां शब्द नीति बनाते हैं, और जब राष्ट्रीय नेता शब्दों की मर्यादा भूलते हैं तो विपक्ष की विश्वसनीयता खुद ही कमजोर होने लगती है। अगर शब्दों पर नियंत्रण नहीं है तो क्या रणनीति पर नियंत्रण है, और अगर रणनीति भी भावनाओं के भरोसे चल रही है तो यह विपक्ष की परिपक्वता पर बड़ा सवाल खड़ा करता है। राजनीति में विरोध करना अधिकार है, लेकिन शब्दों का चुनाव जिम्मेदारी है, और जब जिम्मेदारी हल्की हो जाती है तो नेतृत्व भी हल्का दिखने लगता है। क्या यह सिर्फ चूक थी या फिर राजनीतिक लापरवाही की आदत बनती जा रही है।

क्या कांग्रेस मुद्दों से भागकर मंचीय उत्तेजना में शरण ले रही है?

पंजाब में कांग्रेस पहले ही संगठनात्मक संकट से जूझ रही है, गुटबाजी है, नेतृत्व पर सवाल हैं, और ऐसे समय में बयान ऐसा दिया जाता है जो विरोधियों को सीधा हथियार पकड़ा दे, तो इसे रणनीति नहीं कहा जा सकता, इसे आत्मघाती जल्दबाज़ी कहा जाएगा। जब विपक्ष सरकार को बेरोज़गारी, नशे, कानून व्यवस्था और आर्थिक सवालों पर घेर सकता है, तब अगर बहस भाषा और बयान पर आ जाए तो इसका मतलब है कि असली मुद्दे पीछे छूट गए हैं और मंच की गर्मी हावी हो गई है। क्या यह हताशा है, या सुर्खियों की राजनीति, या फिर यह मान लिया गया है कि तीखे शब्द ही ताकत का प्रमाण हैं। इतिहास बताता है कि शोर से भीड़ जुटती है, लेकिन भरोसा नहीं बनता। और राजनीति अंत में भरोसे पर ही टिकती है।

क्या वरिष्ठ नेताओं का मंच व्यंग्य का अखाड़ा बन चुका है?

प्रताप सिंह बाजवा जैसे अनुभवी नेता जब किसी मंत्री के पुराने पेशे पर तंज कसते हैं और कहते हैं कि वह पहले बैंड बजाते थे और अब पंजाब का बैंड बजा रहे हैं, तो यह लाइन तालियां तो बटोर सकती है, लेकिन यह राजनीति को हल्का भी करती है, क्योंकि यह बहस को मुद्दों से हटाकर निजी पृष्ठभूमि पर ले जाती है। किसी का संघर्ष उसका अपमान नहीं होना चाहिए, और अगर राजनीति में पेशा ताने का विषय बन जाए तो यह समाज के मेहनतकश तबके के लिए गलत संदेश देता है कि सम्मान वंश से तय होगा, परिश्रम से नहीं। वरिष्ठता का मतलब जिम्मेदारी होता है, और जब जिम्मेदारी की जगह व्यंग्य ले लेता है तो विपक्ष की नैतिक जमीन कमजोर हो जाती है। क्या यह राजनीतिक परिपक्वता है या मंचीय उत्तेजना का असर। और क्या यह दिखाता नहीं कि बहस की जगह कटाक्ष ने ले ली है।

क्या असली समस्या विपक्ष का अहंकार है?

राजनीति में सबसे खतरनाक स्थिति वह होती है जब पार्टी को लगता है कि वह स्वाभाविक विकल्प है और जनता चाहे या न चाहे, उसे लौटना ही है, क्योंकि तब आत्ममंथन रुक जाता है और बयानबाज़ी बढ़ जाती है। अगर जनता को यह संदेश जाए कि कुछ नेता जमीन से उठे लोगों को बराबरी से स्वीकार नहीं कर पा रहे, तो यह सिर्फ एक बयान का विवाद नहीं रहता, यह मानसिकता की बहस बन जाता है। बीजेपी से लड़ाई अपनी जगह है, लेकिन अगर विपक्ष खुद को सुधारने की जगह केवल शब्दों की तलवार चलाएगा तो नुकसान भीतर से शुरू होगा। अहंकार धीरे-धीरे संगठन को खोखला करता है और नेता को वास्तविकता से काट देता है। और राजनीति में जमीन से कटना सबसे बड़ा जोखिम होता है।

क्या यह नया दौर है या पुरानी शैली की वापसी?

कांग्रेस खुद को नई राजनीति का चेहरा बताती है, लेकिन अगर भाषा में वही पुराना तंज, वही ऊंचे मंच से नीचे देखने की प्रवृत्ति और वही भावनात्मक लापरवाही दिखे तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या पार्टी सचमुच बदली है या सिर्फ चेहरे बदले हैं। आज का दौर रिकॉर्डिंग का दौर है, हर शब्द वायरल होता है, हर बयान काटकर फैलता है, और ऐसे समय में अगर नेता अब भी मंचीय जोश में शब्द फेंक रहे हैं तो यह राजनीतिक प्रशिक्षण की कमी दिखाता है। विपक्ष का काम सरकार को तथ्यों से घेरना है, निजी कटाक्ष से नहीं, और अगर भाषा ही हथियार बन जाए तो मुद्दे पीछे छूट जाते हैं। नैरेटिव सिर्फ हमला करके नहीं बनता, विश्वसनीयता बनाकर बनता है। और विश्वसनीयता संयम से आती है, उत्तेजना से नहीं।

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