'भारत की एकता के पीछे की वह लौह शक्ति, जिसने किया राष्ट्रनिर्माण', भारत के शिल्पकार बने सरदार वल्लभभाई पटेल
15 अगस्त 1947 को जब तिरंगा लहराया एक भारत का सपना अधूरा था. 560+ रियासतों की अलग-अलग आकांक्षाएं देश को बांट रही थीं. सरदार वल्लभभाई पटेल ने अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति से भारत को एकजुट किया. उनके नेतृत्व ने न केवल देश को एक किया, बल्कि इसकी राजनीतिक-सामाजिक नींव को मजबूत किया.

नई दिल्ली: जब 15 अगस्त 1947 को भारत ने स्वतंत्रता प्राप्त की, तब भारतीय तिरंगे ने आकाश में लहराना शुरू किया, लेकिन 'एक भारत' का सपना फिर भी कहीं न कहीं अधूरा था. उस समय भारत एकजुट होने से बहुत दूर था. ब्रिटिश भारत के साथ-साथ 560 से अधिक रियासतें थीं, जिनके पास अपनी स्वतंत्र सत्ता और विभिन्न आकांक्षाएं थीं. ऐसे समय में, जब एक संयुक्त राष्ट्र बनाने का सपना अनिश्चित सा था, सरदार वल्लभभाई पटेल ने अपनी अडिग इच्छाशक्ति और नेतृत्व से भारत को एकजुट करने का कार्य किया. उनके नेतृत्व में भारत ने न सिर्फ एकीकृत होकर नई दिशा पकड़ी, बल्कि उन्होंने देश की राजनीतिक और सामाजिक संरचना को भी एक नया रूप दिया.
पटेल का योगदान भारतीय गणराज्य के प्रशासनिक ढांचे को भी मजबूत किया,. उनके द्वारा किए गए प्रयासों और कूटनीतिक सूझबूझ के कारण ही भारत की विविधता में एकता की नींव रखी जा सकी. आज, उनकी मृत्यु के बाद भी सरदार पटेल की दूरदृष्टि और राष्ट्रीय एकता के प्रति उनकी प्रतिबद्धता भारत के लिए एक प्रेरणा स्रोत बनी हुई है.
एकीकरण का मिशन
सरदार वल्लभभाई पटेल के लिए एकीकरण एक कठिन लेकिन जरूरी मिशन था. उनके साथ वी.पी. मेनन जैसे काबिल सचिव थे, जिन्होंने रियासतों के शासकों को भारत में सम्मिलित होने के लिए राजी किया. यह काम किसी राजनीतिक या कूटनीतिक चाल से कहीं अधिक था. यह एक राष्ट्रीय जिम्मेदारी थी. पटेल और उनकी टीम ने रियासतों के शासकों के साथ समझौते किए और एग्रीमेंट ऑफ एक्सेशन (Instrument of Accession) को कानूनी रूप में स्वीकार कराया.
रियासतों के एकीकरण की प्रक्रिया
1949 तक लगभग सभी रियासतें भारतीय संघ में सम्मिलित हो चुकी थीं, हालांकि कुछ जटिल मामलों- जैसे हैदराबाद, जूनागढ़ और कश्मीर में समय लगा. पटेल ने इस प्रक्रिया को बेहद सूझबूझ और संवेदनशीलता के साथ संभाला. उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि रियासतों के शासकों को भारतीय संघ में शामिल होने से पहले अपने आत्मसम्मान और जिम्मेदारी की भावना को समझाया जाए.
पटेल ने कहा था कि अब हर भारतीय को भूल जाना चाहिए कि वह राजपूत है, सिख है या जाट उसे केवल यह याद रखना चाहिए कि वह भारतीय है. यह शब्द केवल एक राजनीतिक बयान नहीं थे, बल्कि यह स्वतंत्र भारत की पहली कूटनीतिक रणनीति थी, जिसने देश के एकता के सूत्र को पक्का किया.
भारत के एकीकरण से राष्ट्र निर्माण तक की यात्रा
सरदार पटेल का योगदान सिर्फ रियासतों के एकीकरण तक सीमित नहीं था. वे भारत के पहले गृह मंत्री बने और उन्होंने भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) और भारतीय पुलिस सेवा (IPS) की स्थापना की. उनका मानना था कि ये संस्थाए ही देश की एकता और प्रशासन को सुदृढ़ करेंगी. पटेल के दृष्टिकोण और कार्यों ने भारत को एक मजबूत प्रशासनिक ढांचा प्रदान किया, जो आज भी देश की रीढ़ है. उन्होंने कहा कि भारत की एकता बल प्रयोग से नहीं, बल्कि विश्वास से प्राप्त हुई है. यह विचार उनके राजनीतिक दर्शन का सबसे गहरा सत्य था, जो आज भी प्रासंगिक है.
पटेल की योगदान की याद
सरदार पटेल के अद्वितीय योगदान को सम्मानित करते हुए, भारत सरकार ने 2014 में 31 अक्टूबर को राष्ट्रीय एकता दिवस (Rashtriya Ekta Diwas) के रूप में मनाने की शुरुआत की. इस दिन विभिन्न प्रकार के कार्यक्रम जैसे रन फॉर यूनिटी, सामूहिक शपथ ग्रहण और भव्य एकता परेड आयोजित किए जाते हैं, जो भारत की एकता के प्रति नागरिकों की जिम्मेदारी को दर्शाते हैं. इस दिन की अहमियत तब और भी बढ़ जाती है जब हम सरदार पटेल की 150वीं जयंती मना रहे हैं.
विरासत का पुनर्जीवन
स्वतंत्रता के 78 साल बाद भी, भारत की आंतरिक एकता की आवश्यकता लगातार बनी रहती है. क्षेत्रीय और सामाजिक विविधताओं, भाषाई भिन्नताओं और राजनीतिक ध्रुवीकरण के बावजूद सरदार पटेल का संदेश आज भी हमारे लिए प्रासंगिक है. उनका कहना था कि एकता के बिना मानव शक्ति कोई शक्ति नहीं है, जब तक वह संगठित और समन्वित न हो.
सरदार वल्लभभाई पटेल की विचारधारा और कार्यशैली हर उस प्रयास में जीवित हैं, जो एक बेहतर और सशक्त भारत बनाने की दिशा में किया जाता है. उनका योगदान सिर्फ राजनीतिक नहीं, बल्कि हमारे राष्ट्र निर्माण की एक मजबूत नींव है.


