सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला, सेना में महिलाओं को मिलेगा बराबरी का हक
सुप्रीम कोर्ट ने महिला शॉर्ट सर्विस कमीशन अधिकारियों को स्थायी कमीशन देने का ऐतिहासिक फैसला सुनाया. कोर्ट ने मूल्यांकन में भेदभाव और मनमानी सीमाओं को गलत ठहराते हुए महिलाओं को समान अवसर और पेंशन सहित सभी लाभ देने के निर्देश दिए.

नई दिल्ली: देश की सशस्त्र सेनाओं में महिलाओं की भूमिका को लेकर एक बड़ा और ऐतिहासिक बदलाव सामने आया है. सर्वोच्च न्यायालय ने ऐसा फैसला सुनाया है, जो न सिर्फ महिला अधिकारियों के अधिकारों को मजबूत करता है, बल्कि लंबे समय से चले आ रहे भेदभाव पर भी सवाल उठाता है. इस निर्णय के बाद अब महिला शॉर्ट सर्विस कमीशन (SSC) अधिकारियों के लिए करियर के नए दरवाजे खुल गए हैं.
सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि महिला एसएससी अधिकारियों को स्थायी कमीशन (Permanent Commission) से वंचित करना गलत और भेदभावपूर्ण है. अदालत ने अपने विशेष अधिकारों का उपयोग करते हुए यह सुनिश्चित किया कि महिलाओं को पुरुष अधिकारियों के समान अवसर मिलें.
मनमानी सीमा पर उठाए सवाल
अदालत ने प्रति वर्ष 250 महिला अधिकारियों की सीमा को पूरी तरह मनमाना बताया. कोर्ट के मुताबिक, यह सीमा किसी ठोस आधार पर नहीं टिकी थी और इससे महिलाओं के अधिकारों का हनन हो रहा था. इसलिए इसे उचित नहीं माना जा सकता.
क्या होता है शॉर्ट सर्विस और स्थायी कमीशन
शॉर्ट सर्विस कमीशन के तहत अधिकारियों की नियुक्ति 10 साल के लिए होती है, जिसे बढ़ाकर 14 साल तक किया जा सकता है. इसके बाद उन्हें सेवा छोड़नी पड़ती है, जिससे उन्हें पेंशन और आगे बढ़ने के अवसर सीमित मिलते हैं. वहीं, स्थायी कमीशन अधिकारियों को लंबी अवधि तक सेवा करने का मौका देता है. इसमें वे रिटायरमेंट तक काम कर सकते हैं, पेंशन पाते हैं और उच्च पदों तक पदोन्नति का अवसर भी मिलता है.
मूल्यांकन प्रक्रिया में खामियां
सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि महिला अधिकारियों का मूल्यांकन सही तरीके से नहीं किया गया. उनकी वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट (ACR) बनाते समय यह मान लिया जाता था कि वे स्थायी कमीशन के लिए योग्य नहीं होंगी. इस सोच के कारण उनके मूल्यांकन पर नकारात्मक असर पड़ा.
अदालत ने यह भी कहा कि महिला अधिकारियों को ऐसे ट्रेनिंग कोर्स और जिम्मेदारियां नहीं दी गईं, जो उनके करियर को आगे बढ़ाने में मदद करतीं. इससे उनकी तरक्की पर असर पड़ा और वे पुरुष अधिकारियों से पीछे रह गईं. कोर्ट ने निर्देश दिया कि जो महिला अधिकारी स्थायी कमीशन के योग्य हैं, उन्हें 20 साल की सेवा पूरी मानकर पेंशन और अन्य सभी लाभ दिए जाएं. यह राहत उन अधिकारियों को भी मिलेगी, जिन्हें पहले चयन प्रक्रिया में अयोग्य ठहराया गया था.
तीनों सेनाओं के लिए अलग-अलग निर्देश
नौसेना के मामले में कोर्ट ने कहा कि योग्य महिला अधिकारियों को मेडिकल रूप से फिट होने पर स्थायी कमीशन दिया जाए. साथ ही 2009 के बाद भर्ती हुई महिलाओं को भी इसका लाभ मिलेगा. वायुसेना के लिए अदालत ने माना कि जिन अधिकारियों को सही मूल्यांकन का मौका नहीं मिला, उन्हें इसका नुकसान नहीं उठाना चाहिए. हालांकि, नए सिरे से चयन प्रक्रिया शुरू करने को कोर्ट ने जरूरी नहीं माना.
पारदर्शिता और सुधार की जरूरत
सुप्रीम कोर्ट ने रक्षा मंत्रालय और संबंधित विभागों को निर्देश दिया कि चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता लाई जाए. साथ ही मूल्यांकन प्रणाली की समीक्षा करने को कहा, ताकि भविष्य में किसी भी तरह का भेदभाव न हो. यह फैसला न केवल महिला अधिकारियों के लिए राहत लेकर आया है, बल्कि सशस्त्र बलों में समानता और न्याय की दिशा में एक मजबूत कदम भी माना जा रहा है.


