कच्चे तेल की कीमतों में उछाल, क्या भारत में बढ़ेंगे पेट्रोल-डीजल के दाम? समझिए पूरा मामला
अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल ने वैश्विक अर्थव्यवस्था के साथ भारत की चिंता भी बढ़ा दी है.हालांकि कीमतों में भारी बढ़ोतरी के बावजूद देश में पेट्रोल-डीजल के दाम फिलहाल स्थिर हैं, लेकिन आने वाले समय को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है.

नई दिल्ली: अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल देखने को मिल रहा है, जिससे वैश्विक ऊर्जा बाजार में हलचल मच गई है. खाड़ी क्षेत्र में युद्ध शुरू होने के बाद से तेल की लागत में भारी बढ़ोतरी हुई है, जिसका सीधा असर भारतीय तेल कंपनियों पर पड़ रहा है.
हालांकि, इतनी बड़ी वृद्धि के बावजूद भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतें फिलहाल स्थिर बनी हुई हैं. दिल्ली और मुंबई जैसे प्रमुख शहरों में ईंधन के दामों में कोई बदलाव नहीं किया गया है, लेकिन मौजूदा हालात को देखते हुए भविष्य को लेकर सवाल उठने लगे हैं.
कच्चे तेल की कीमतों में जबरदस्त उछाल
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की कीमतें तेजी से बढ़कर 136.56 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई हैं. खाड़ी क्षेत्र में युद्ध के चलते भारतीय रिफाइनरियों के लिए कच्चे तेल की लागत में करीब 93% का उछाल आया है. इसका असर इंडियन ऑयल, एचपीसीएल, बीपीसीएल और रिलायंस इंडस्ट्रीज जैसी कंपनियों के मुनाफे पर पड़ा है.
पेट्रोल-डीजल के दाम फिलहाल स्थिर
तेल की कीमतों में बढ़ोतरी के बावजूद भारत में पेट्रोल-डीजल के दाम अभी स्थिर हैं. दिल्ली में पेट्रोल 94.72 रुपये और डीजल 87.62 रुपये प्रति लीटर पर बना हुआ है. मुंबई में भी कीमतों में कोई बदलाव नहीं हुआ है.
अंतरराष्ट्रीय बाजार का असर
अमेरिका समेत कई देशों ने कच्चे तेल की कीमतों के अनुरूप अपने यहां पेट्रोल के दाम बढ़ा दिए हैं. अमेरिका में पेट्रोल की कीमत 3.7 डॉलर प्रति गैलन तक पहुंच गई है. इसके विपरीत, भारत में तेल कंपनियां फिलहाल कीमतों को स्थिर रखे हुए हैं, जिससे उनके मार्जिन पर दबाव बढ़ रहा है.
चुनावी माहौल का असर
सरकार की ओर से संकेत हैं कि 31 मार्च तक कीमतों या करों में कोई बदलाव नहीं किया जाएगा, ताकि बजट संतुलन बना रहे. इसके साथ ही, चार राज्यों और पुडुचेरी में होने वाले चुनावों को देखते हुए 29 अप्रैल तक पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ने की संभावना कम मानी जा रही है.
होर्मुज जलडमरूमध्य बना संकट की जड़
वैश्विक तेल संकट का प्रमुख कारण ईरान द्वारा होर्मुज जलडमरूमध्य को अवरुद्ध करना माना जा रहा है. यह जलमार्ग दुनिया की कुल तेल और गैस आपूर्ति का लगभग 20% संभालता है. भारत के लिए यह स्थिति और भी गंभीर है, क्योंकि देश की करीब 60% ऊर्जा आपूर्ति इसी रास्ते से आती है.
कीमतों में उतार-चढ़ाव जारी
ब्रेंट क्रूड की कीमतें हाल ही में 120 डॉलर प्रति बैरल के स्तर तक पहुंच गई थीं. हालांकि, अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) द्वारा आपातकालीन भंडार से 40 करोड़ बैरल तेल जारी करने के फैसले के बाद कुछ राहत मिली. फिर भी, जब तक समुद्री मार्ग पूरी तरह सामान्य नहीं होते, तब तक कीमतों में अस्थिरता बनी रहने की आशंका है.
अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है असर
आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि कच्चे तेल की ऊंची कीमतें भारत की अर्थव्यवस्था पर दबाव डाल सकती हैं. एक्सिस बैंक के मुख्य अर्थशास्त्री नीलकंठ मिश्रा के अनुसार, अगर तेल की कीमत एक साल तक 100 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बनी रहती है, तो भारत का आयात बिल काफी बढ़ सकता है और व्यापार संतुलन पर भारी असर पड़ सकता है.
आईसीआरए की रिपोर्ट में भी कहा गया है कि ऊर्जा आपूर्ति में लंबे समय तक बाधा आने से देश की आर्थिक स्थिति प्रभावित हो सकती है. वहीं हार्वर्ड यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर गीता गोपीनाथ के अनुसार, "अगर 2026 के लिए कच्चे तेल की औसत कीमत 85 डॉलर प्रति बैरल रहती है, तो वैश्विक विकास दर 0.3-0.4 प्रतिशत अंक गिर सकती है और मुख्य मुद्रास्फीति 60 बेसिस पॉइंट बढ़ सकती है."


