जम्मू-कश्मीर में पर्यटकों को नहीं मिलेगी सुरक्षा, सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की याचिका, पिटीशनर को लगाई फटकार
भारत के जम्मू-कश्मीर के पहलगाम क्षेत्र में आतंकी हमले के बाद पर्यटकों की सुरक्षा बढ़ाने के लिए दायर जनहित याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया. कोर्ट ने याचिकाकर्ता को फटकार लगाते हुए कहा कि याचिका में कोई ठोस जनहित नहीं था और यह केवल प्रचार प्राप्त करने के उद्देश्य से थी. कोर्ट ने यह भी कहा कि जनहित याचिकाएं केवल वास्तविक सार्वजनिक हित के मामलों में दायर की जानी चाहिए.

भारत के जम्मू-कश्मीर के पहलगाम क्षेत्र में हाल ही में हुए आतंकी हमले के बाद, पर्यटकों की सुरक्षा बढ़ाने की मांग करते हुए एक जनहित याचिका (PIL) दायर की गई थी. इस याचिका में विशेष रूप से पहाड़ी और दूरदराज के क्षेत्रों में पर्यटकों के लिए सुरक्षा उपायों को सख्त करने की अपील की गई थी. हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को इस याचिका को खारिज कर दिया और याचिकाकर्ता को कड़ी फटकार लगाई, यह कहते हुए कि याचिका में कोई ठोस और वास्तविक सार्वजनिक चिंता नहीं है.
याचिका पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट की पीठ, जिसमें न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति एन कोटिश्वर सिंह शामिल थे, ने याचिकाकर्ता से तीखी टिप्पणी की और कहा कि इस याचिका का उद्देश्य केवल प्रचार प्राप्त करना प्रतीत होता है. कोर्ट ने याचिकाकर्ता से पूछा, "आप बार-बार जनहित याचिका क्यों दायर कर रहे हैं? आपको कौन उकसा रहा है?" कोर्ट ने यह भी कहा कि याचिका में कोई वास्तविक जनहित की भावना नहीं है, बल्कि यह केवल एक प्रचार के रूप में सामने आई है.
याचिका में क्या था?
जनहित याचिका में यह मांग की गई थी कि केंद्रीय गृह मंत्रालय और राज्य सरकारों को पहाड़ी और दूरदराज के क्षेत्रों में पर्यटकों की सुरक्षा के लिए उपायों को लागू करने का निर्देश दिया जाए. इसके अतिरिक्त, याचिकाकर्ता ने यह भी मांग की थी कि इन क्षेत्रों में उपयुक्त चिकित्सा सुविधाएं शुरू की जाएं ताकि किसी आपातकालीन स्थिति में पर्यटकों को तुरंत चिकित्सा सहायता मिल सके.
याचिकाकर्ता का तर्क था कि विशेष रूप से पर्वतीय क्षेत्रों और दूरदराज के स्थानों पर पर्यटकों की सुरक्षा में कमी है, जो आतंकवादी हमलों और प्राकृतिक आपदाओं के कारण संकट में पड़ सकते हैं.
कोर्ट ने खारिज की याचिका
सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता के इन तर्कों पर गंभीरता से विचार किया, लेकिन कोर्ट का मानना था कि याचिका में कोई ठोस आधार नहीं था और यह केवल सार्वजनिक ध्यान आकर्षित करने के उद्देश्य से दायर की गई थी. कोर्ट ने यह भी कहा कि इस तरह की जनहित याचिकाओं का न्यायिक प्रक्रिया पर अनावश्यक दबाव बनता है और इस मामले में कोई वास्तविक संवेदनशीलता नहीं दिखाई दी.
कोर्ट ने याचिकाकर्ता से यह भी कहा कि जनहित याचिकाएं उन मुद्दों के लिए होनी चाहिए, जो वाकई में सार्वजनिक हित से जुड़ी हों, न कि केवल व्यक्तिगत प्रचार के लिए. इस प्रकार, कोर्ट ने याचिका को पूरी तरह से खारिज कर दिया.


