अब खुली जगह पर नमाज की इजाजत नहीं... इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, पढ़ें रिपोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने संभल के एक मामले में सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की। याचिकाकर्ता असीन ने आबादी भूमि के हिस्से में बने निजी परिसर में नमाज अदा करने की अनुमति मांगी थी।

Sachin Hari Legha

नई दिल्ली: सार्वजनिक जगहों पर नमाज पढ़ने को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने साफ कहा कि सार्वजनिक स्थल सभी के लिए है। धार्मिक आजादी के नाम पर उस पर कब्जे की इजाजत नहीं दी जा सकती। कोर्ट ने दो-टूक कहा कि सार्वजनिक भूमि कानून से नियंत्रित होती है। कोई भी व्यक्ति नियमित धार्मिक आयोजनों के लिए इसका इस्तेमाल करने का दावा नहीं कर सकता।

हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी   

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार इलाहाबाद हाईकोर्ट ने संभल के एक मामले में सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की। याचिकाकर्ता असीन ने आबादी भूमि के हिस्से में बने निजी परिसर में नमाज अदा करने की अनुमति मांगी थी। जस्टिस सरल श्रीवास्तव और जस्टिस गरिमा प्रसाद की डिवीजन बेंच ने याचिका खारिज कर दी। साथ ही कई महत्वपूर्ण बातें कहीं।

आजादी के साथ जिम्मेदारी भी जरूरी- AHC 

आपको बताते चलें कि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि संवैधानिक समाज में आजादी के साथ हमेशा दूसरों के प्रति जिम्मेदारी भी जुड़ी होती है। संविधान धर्म मानने का अधिकार देता है, लेकिन यह अधिकार सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के अधीन है।

यह असीमित अधिकार नहीं है। इसका इस्तेमाल इस तरह नहीं किया जा सकता कि दूसरों पर असर पड़े या सार्वजनिक जीवन के सामान्य कामकाज में रुकावट आए। जैसा अक्सर कहा जाता है, एक इंसान की आजादी वहीं खत्म हो जाती है जहां वह किसी और पर असर डालना शुरू करती है।

सार्वजनिक स्थल पर सभी का बराबर हक   

अदालत ने इस दौरान कहा कि सार्वजनिक भूमि पर किसी एक पक्ष का एकाधिकार नहीं हो सकता। उस पर सभी नागरिकों का समान अधिकार है। इस तरह के इस्तेमाल से आने-जाने, पहुंच और सुरक्षा पर असर पड़ता है। समाज के बीच संतुलन भी बिगड़ सकता है। इसलिए इसे नियमित किया जाना चाहिए।

राज्य की जिम्मेदारी: बराबर पहुंच और व्यवस्था   

AHC ने माना कि यह राज्य की जिम्मेदारी है कि वह सभी तक बराबर पहुंच, नागरिक व्यवस्था और बिना भेदभाव वाला प्रशासन सुनिश्चित करे। विधि-व्यवस्था बनाए रखने के लिए सरकार को दखल का पूरा अधिकार है। राज्य को संवैधानिक अधिकार है और सही मामलों में यह उसका कर्तव्य भी है कि वह बिना कानूनी अधिकार के सार्वजनिक भूमि के इस्तेमाल को रोके।

पहले से कार्रवाई कर सकता है राज्य   

हाईकोर्ट ने जोर देकर कहा कि कानून अधिकारियों को किसी असली गड़बड़ी के होने का इंतजार करने की जरूरत नहीं बताता। जहां किसी गतिविधि से सार्वजनिक व्यवस्था पर असर पड़ने की संभावना हो, वहां राज्य को पहले से कार्रवाई का अधिकार है। यह दृष्टिकोण धर्मनिरपेक्षता के संवैधानिक सिद्धांत के अनुरूप है। इसके तहत सभी धर्मों के साथ समान व्यवहार और कानून का समान रूप से पालन होना चाहिए।

निजी पूजा की इजाजत, पर सार्वजनिक व्यवस्था जरूरी   

वहीं AHC ने माना कि राज्य को निजी पूजा की अनुमति देनी चाहिए। लेकिन वह उन गतिविधियों को नियमित करने के लिए भी बाध्य है जो सार्वजनिक व्यवस्था को प्रभावित करती हैं। चाहे वो सार्वजनिक भूमि पर हों या निजी परिसर में। अनुच्छेद 25 और 26 के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए यह संतुलन बनाए रखना जरूरी है।

याचिका में कमी, जमीन का रिकॉर्ड साफ नहीं   

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि याचिका में दलीलें साफ नहीं हैं। उनमें जरूरी जानकारी की कमी है। रिकॉर्ड के मुताबिक जिस जमीन पर नमाज की बात हो रही है, वह सार्वजनिक भूमि के तौर पर दर्ज है। उसमें गाटा या खाता नंबर जैसी बेसिक जानकारी नहीं है। यह सिर्फ साफ-साफ बताई गई बाउंड्री पर आधारित है। ऐसा डॉक्यूमेंट पहचान वाला टाइटल साबित नहीं करता और रेवेन्यू रिकॉर्ड की जगह नहीं ले सकता।

याचिकाकर्ता का दावा: मौलिक अधिकारों का उल्लंघन   

गौरतलब है कि इस मामले को लेकर याचिकाकर्ता ने दावा किया था कि उसकी निजी जमीन संभल के गुन्नौर तहसील के गांव इकोना, परगना राजपुरा में है। 82.80 वर्ग मीटर एरिया में वह नमाज पढ़ना चाहता है। प्रशासन उसे रोक रहा है।

उसने कहा कि यह अनुच्छेद 19, 25, 26, 27 और 28 का उल्लंघन है। इस्लाम को मानने वाले बिना दखल के नमाज पढ़ने के हकदार हैं। उसने आरोप लगाया कि कुछ सामाजिक तत्वों की मिलीभगत से दखल दिया जा रहा है।

याचिकाकर्ता के वकील ने हाईकोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला दिया। मुनाजिर खान बनाम स्टेट ऑफ यूपी, पास्टर सेल्वाकुमार सामू बनाम स्टेट ऑफ यूपी, मरंथा फुल गॉस्पेल मिनिस्ट्रीज बनाम स्टेट ऑफ यूपी और इमैनुएल ग्रेस चैरिटेबल ट्रस्ट बनाम स्टेट ऑफ यूपी के मामलों में कहा गया था कि प्राइवेट जगह पर बिना पहले से इजाजत के प्रार्थना की जा सकती है।

सरकार का क्या है पक्ष?   

अवगत करवाते चलें कि सरकारी वकील ने लिखित निर्देशों के आधार पर बताया कि जमीन आबादी के तौर पर दर्ज है। यानी सार्वजनिक उपयोग के लिए है। याचिकाकर्ता का इस पर कोई मालिकाना हक नहीं है। सब-डिविजनल मजिस्ट्रेट की रिपोर्ट के मुताबिक पारंपरिक रूप से उस जगह पर सिर्फ ईद के मौके पर ही नमाज पढ़ी जाती है।

इस स्थापित प्रथा पर कोई रोक नहीं है। लेकिन, याची गांव के अंदर और बाहर से लोगों को बुलाकर रोज बड़े पैमाने पर सामूहिक नमाज शुरू करना चाहता है। इकोना गांव की आबादी मिली-जुली है और दशकों से शांतिपूर्ण रही है। सरकारी वकील ने कई सरकारी आदेशों का हवाला दिया।

इनमें कहा गया है कि धार्मिक रीति-रिवाजों का सम्मान होना चाहिए। लेकिन किसी भी नई परंपरा या गैर-पारंपरिक गतिविधियों की इजाजत नहीं दी जाएगी। पब्लिक ऑर्डर बनाए रखने के लिए पहले से चली आ रही रीति-रिवाजों का पालन होना चाहिए।

हिंदू त्योहारों पर भी यही नियम   

राज्य सरकार ने कहा कि होलिका दहन जैसे हिंदू त्योहारों के लिए भी यही निर्देश है। ऐसे समारोह केवल पारंपरिक जगहों पर ही किए जाएंगे। सार्वजनिक सड़कों या नई जगहों पर नहीं। इससे स्थापित परंपराओं के संरक्षण की प्रशासनिक नीति मजबूत होती है।

कोर्ट का निष्कर्ष: धार्मिक आजादी की सीमा   

सभी पक्षों को सुनने के बाद कोर्ट ने कहा कि मुद्दा यह है कि अनुच्छेद 25 और 26 के तहत मिले अधिकार किस हद तक सामूहिक धार्मिक गतिविधियों पर लागू होते हैं। चाहे वह सार्वजनिक भूमि पर हो या प्राइवेट जगह पर।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने साफ किया कि यदि कोई पक्ष परंपरा से हटकर सार्वजनिक स्थान का उपयोग किसी विशेष धार्मिक गतिविधि के लिए करना चाहता है तो कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए राज्य सरकार हस्तक्षेप कर सकती है।

साथ ही यह भी कहा कि किसी एक समुदाय की धार्मिक स्वतंत्रता दूसरे समुदाय के अधिकारों पर निर्भर करती है। कोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि इन हालात में कोई लागू करने लायक कानूनी अधिकार नहीं बनता। खासकर तब जब मामले का सार्वजनिक व्यवस्था और सामाजिक सद्भाव पर असर हो।

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