बदरीनाथ धाम के पास ग्लेशियर टूटने से मचा हड़कंप, हिमालय में बदलता मौसम बना खतरे की घंटी

बदरीनाथ धाम से करीब चार किलोमीटर दूर कंचनगंगा क्षेत्र के ऊपर स्थित एक ग्लेशियर का हिस्सा टूट गया. घटना के बाद स्थानीय प्रशासन और आपदा प्रबंधन विभाग सतर्क हो गया है.

Shraddha Mishra

बदरीनाथ: उत्तराखंड के ऊंचे हिमालयी इलाकों से एक बार फिर चिंताजनक खबर सामने आई है. बदरीनाथ धाम से करीब चार किलोमीटर दूर कंचनगंगा क्षेत्र के ऊपर स्थित एक ग्लेशियर का हिस्सा टूट गया. राहत की बात यह रही कि इस घटना में किसी तरह के जान-माल के नुकसान की सूचना नहीं मिली, लेकिन वैज्ञानिकों और प्रशासन की चिंता जरूर बढ़ गई है. लगातार बदलते मौसम और बढ़ते तापमान के कारण हिमालयी ग्लेशियरों पर दबाव बढ़ता जा रहा है, जिसका असर अब साफ दिखाई देने लगा है.

घटना के बाद स्थानीय प्रशासन और आपदा प्रबंधन विभाग सतर्क हो गया है. चमोली के पुलिस अधीक्षक सुरजीत सिंह पंवार ने बताया कि फिलहाल स्थिति नियंत्रण में है और पूरे इलाके पर लगातार निगरानी रखी जा रही है. हिमालयी क्षेत्रों में रहने वाले लोगों और तीर्थ यात्रियों के लिए इस तरह की घटनाएं चिंता का विषय बनती जा रही हैं. खासकर गर्मियों के मौसम में तापमान बढ़ने के साथ ग्लेशियर तेजी से पिघलने लगते हैं, जिससे उनके टूटने या खिसकने की आशंका बढ़ जाती है.

बदल रहा है हिमालय में बर्फबारी का पैटर्न

पर्यावरण वैज्ञानिकों का कहना है कि हिमालय में मौसम का स्वरूप तेजी से बदल रहा है. पहले जहां जनवरी और फरवरी को भारी बर्फबारी का समय माना जाता था, वहीं अब मार्च और अप्रैल में अधिक बर्फ गिर रही है. इस बदलाव का सीधा असर ग्लेशियरों पर पड़ रहा है. वाडिया हिमालय भू-विज्ञान संस्थान के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए अध्ययन में यह सामने आया है कि बर्फबारी के समय और मात्रा में बदलाव के कारण ग्लेशियर कमजोर हो रहे हैं. यह शोध जर्मनी की एक अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिका में भी प्रकाशित किया गया है. 

विशेषज्ञों के अनुसार, सर्दियों में पश्चिमी विक्षोभ कमजोर पड़ रहा है, जिससे ठंड के मौसम में पहले जैसी बर्फबारी नहीं हो रही. इसके उलट गर्मियों के दौरान पश्चिमी विक्षोभ ज्यादा सक्रिय हो रहा है, जिससे मार्च-अप्रैल में बर्फबारी, बारिश और ओलावृष्टि जैसी घटनाएं बढ़ रही हैं. पिंडारी और कफनी जैसे ग्लेशियर भी इसी बदलाव का असर झेल रहे हैं. गर्म महीनों में गिरने वाली बर्फ तेजी से पिघल जाती है, जिससे ग्लेशियरों की मजबूती कम हो रही है.

बढ़ सकता है आर्थिक और पर्यावरणीय संकट

विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि हिमालय में बदलता मौसम केवल पर्यावरणीय संकट नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक चुनौतियां भी पैदा कर सकता है. इसका असर खेती, खाद्य सुरक्षा, पर्यटन और बागवानी पर पड़ सकता है. विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ग्लेशियर लगातार कमजोर होते रहे तो भविष्य में नदियों के जलस्तर और जलधाराओं पर भी असर पड़ेगा. इससे पहाड़ी क्षेत्रों में प्राकृतिक आपदाओं का खतरा और बढ़ सकता है.

अध्ययन में यह भी सामने आया है कि कई ग्लेशियर क्षेत्रों में तापमान सामान्य से काफी अधिक रिकॉर्ड किया गया. कुछ जगहों पर तापमान में पांच डिग्री सेल्सियस तक की बढ़ोतरी देखी गई है. वैज्ञानिकों का कहना है कि यही वजह है कि नई बर्फ टिक नहीं पा रही और तेजी से पिघल रही है. विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि अगर यही स्थिति जारी रही तो हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियरों का संतुलन बिगड़ सकता है, जिसका असर पूरे उत्तर भारत के जल संसाधनों और मौसम पर दिखाई देगा.

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