Explainer: बीजिंग में महाशक्तियों की लाइन! पहले ट्रंप, अब पुतिन… क्या दुनिया को मिल रहा नया पावर सेंटर?

दुनिया की राजनीति में एक बड़ा बदलाव धीरे धीरे-साफ दिखाई देने लगा है. पहले ट्रंप ने चीन का दौरा किया और अब पुतिन का बीजिंग पहुंचना इस बात का संकेत माना जा रहा है कि चीन ग्लोबल पावर का केंद्र बनता जा रहा है जबकि अब वॉशिंगटन की पावर दुनिया से ढीली पड़ रही है. क्या 21वीं सदी में बीजिंग दुनिया की नई राजनीतिक राजधानी बनने की ओर बढ़ रहा है? यही सवाल अब पूरी दुनिया में चर्चा का विषय बन चुका है.

Lalit Sharma
Edited By: Lalit Sharma

बीजिंग अब सिर्फ चीन की राजधानी नहीं, बल्कि दुनिया की नई राजनीतिक बिसाब का सबसे बड़ा केंद्र बनता दिखाई दे रहा है. पहले ट्रंप का चीन दौरा अब उसके तुरंत बाद व्लादिरमीर पुतिन की बीजिंग एंट्री ने वैश्विक ताकतों की दिशा पर बड़े सवाल खड़े कर दिए है. हालांकि ये दौरा मंगलवाल से शुरू होगा. दुनिया अब ये महसूस करने लगी है कि हर बड़ा फैसला सिर्फ वॉशिंगटन से तय नहीं होगा. चीन, रूस और अमेरिका के बीच चल रही यह नई रणनीतिक शतरंज वैश्विक सत्ता संतुलन बदल सकती है.यही वजह है कि बीजिंग की हलचल ने पूरी दुनिया में नई बेचैनी पैदा कर दी है.  

क्या बदल रहा है दुनिया का पावर सेंटर?

दशकों तक दुनिया की राजनीति, अर्थव्यवस्था और सुरक्षा का सबसे बड़ा केंद्र अमेरिका को माना जाता रहा. वॉशिंगटन से निकले फैसले पूरी दुनिया की दिशा तय करते थे, लेकिन अब तस्वीर बदलती दिखाई दे रही है. चीन की तेजी से बढ़ती आर्थिक ताकत, टेक्नोलॉजी में उसका दबदबा और रूस के साथ उसकी गहरी होती साझेदारी ने वैश्विक समीकरण बदलने शुरू कर दिए हैं. यही वजह है कि अब बीजिंग को एक नए ग्लोबल पावर सेंटर के तौर पर देखा जा रहा है. दुनिया के बड़े नेता लगातार चीन का रुख कर रहे हैं और यह बदलाव सिर्फ कूटनीति तक सीमित नहीं है.

लेकिन कहानी सिर्फ इतनी नहीं है. असली बदलाव यह है कि अब दुनिया अमेरिका से डरकर नहीं, बल्कि अपने हित देखकर फैसले लेने लगी है. अफ्रीका से लेकर अरब देशों तक, हर कोई चीन के साथ नए रिश्ते बना रहा है. बीजिंग अब सिर्फ फैक्ट्री नहीं, रणनीति का नया मुख्यालय बनता जा रहा है. यही वजह है कि दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक मुलाकातें अब व्हाइट हाउस नहीं, बीजिंग में दिखाई देने लगी हैं. और शायद यही 21वीं सदी का सबसे बड़ा बदलाव है.

ट्रंप का चीन दौरा क्यों था खास?

Donald Trump का हालिया चीन दौरा पूरी दुनिया के लिए बेहद अहम माना गया. करीब एक दशक बाद किसी बड़े अमेरिकी नेता की यह महत्वपूर्ण चीन यात्रा थी. ट्रंप अपने साथ अमेरिका की बड़ी टेक कंपनियों के सीईओ भी लेकर पहुंचे थे. इससे साफ था कि अमेरिका अब चीन से सिर्फ टकराव नहीं, बल्कि नए समीकरण बनाने की कोशिश भी कर रहा है. हालांकि इस यात्रा के बाद कोई बड़ी डील सामने नहीं आई, लेकिन दुनिया को यह संदेश जरूर मिला कि चीन को नजरअंदाज करना अब अमेरिका के लिए भी आसान नहीं रह गया है. सबसे दिलचस्प बात यह रही कि ट्रंप जिस आत्मविश्वास के साथ बीजिंग पहुंचे थे, उसी आत्मविश्वास के साथ कोई ठोस परिणाम लेकर वापस नहीं लौट पाए.

यह तस्वीर पूरी दुनिया ने देखी. चीन ने ट्रंप को सम्मान तो दिया, लेकिन झुकने का संकेत नहीं दिया. इससे साफ हो गया कि अब अमेरिका और चीन के रिश्तों में “बॉस और चुनौती” वाला दौर खत्म हो चुका है. अब यह दो बराबरी की ताकतों की लड़ाई बनती जा रही है. यही वजह है कि ट्रंप की यह यात्रा एक राजनीतिक संदेश बन गई.

ट्रंप के तुरंत बाद पुतिन की एंट्री

ट्रंप के चीन से रवाना होने के कुछ ही दिनों बाद Vladimir Putin का बीजिंग दौरा तय हो गया. इसने दुनिया की राजनीतिक हलचल को और तेज कर दिया. रूस और चीन पहले से ही अमेरिका के खिलाफ कई मुद्दों पर एकजुट दिखाई देते रहे हैं. ऐसे में पुतिन का यह दौरा सिर्फ एक औपचारिक मुलाकात नहीं माना जा रहा. माना जा रहा है कि यह दौरा उस नए विश्व व्यवस्था की तस्वीर पेश कर सकता है, जिसमें अमेरिका अकेला सुपरपावर नहीं रहेगा. बीजिंग अब उन देशों का केंद्र बनता दिख रहा है जो पश्चिमी दबदबे से अलग नई रणनीति बनाना चाहते हैं.

यह सिर्फ संयोग नहीं हो सकता कि ट्रंप के जाने के तुरंत बाद पुतिन बीजिंग पहुंच रहे हैं. दुनिया इसे “साइलेंट पावर शो” के तौर पर देख रही है. संदेश साफ है-चीन अब वह जगह बन चुका है जहां दोस्त भी आते हैं और प्रतिद्वंद्वी भी. बीजिंग अब सिर्फ राजधानी नहीं, वैश्विक शक्ति संतुलन का मंच बन रहा है. यही वजह है कि अमेरिका के रणनीतिक विशेषज्ञ भी इस घटनाक्रम को बेहद गंभीरता से देख रहे हैं. क्योंकि यह तस्वीर सीधे तौर पर वॉशिंगटन के प्रभाव को चुनौती देती दिखाई दे रही है।

शी जिनपिंग क्या बना रहे हैं नया गठबंधन?

Xi Jinping पिछले कुछ वर्षों से लगातार चीन को एक वैश्विक शक्ति के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं. बेल्ट एंड रोड प्रोजेक्ट, अफ्रीका और एशिया में निवेश, रूस के साथ रणनीतिक साझेदारी और मध्य पूर्व में बढ़ती सक्रियता इसी रणनीति का हिस्सा मानी जाती है. चीन अब सिर्फ व्यापारिक ताकत नहीं रहना चाहता, बल्कि वह राजनीतिक और सैन्य स्तर पर भी अमेरिका को चुनौती देने की तैयारी में है. यही वजह है कि कई विशेषज्ञ अब “बीजिंग ब्लॉक” की चर्चा करने लगे हैं.

शी जिनपिंग बहुत धीमी लेकिन बेहद खतरनाक रणनीति पर काम कर रहे हैं. वह युद्ध से नहीं, निर्भरता से दुनिया जीतना चाहते हैं. चीन सड़कों, बंदरगाहों, इंटरनेट और निवेश के जरिए देशों को अपने प्रभाव में ला रहा है. यही कारण है कि गरीब और विकासशील देशों में चीन का असर तेजी से बढ़ रहा है. अमेरिका जहां सैन्य ताकत दिखाता है, वहीं चीन आर्थिक जाल बिछा रहा है. और यही मॉडल दुनिया की राजनीति को बदलता दिखाई दे रहा है.

क्या वॉशिंगटन का दबदबा कमजोर पड़ रहा?

एक समय था जब दुनिया का हर बड़ा फैसला अमेरिका की मर्जी से तय होता था. लेकिन अब हालात बदल रहे हैं. यूक्रेन युद्ध, मध्य पूर्व संकट, चीन-ताइवान तनाव और वैश्विक आर्थिक चुनौतियों ने अमेरिका की स्थिति को पहले जितना मजबूत नहीं रहने दिया. दूसरी ओर चीन लगातार अपनी आर्थिक और कूटनीतिक ताकत बढ़ा रहा है. रूस के साथ उसका रिश्ता भी मजबूत हो रहा है. यही कारण है कि अब कई देश अमेरिका और चीन दोनों के बीच संतुलन बनाकर चलना चाहते हैं.

सवाल सिर्फ इतना नहीं कि अमेरिका कमजोर हो रहा है. असली सवाल यह है कि क्या दुनिया अब अमेरिका से थक चुकी है? इराक, अफगानिस्तान और कई युद्धों के बाद पश्चिमी मॉडल पर सवाल उठने लगे हैं. दूसरी तरफ चीन बिना लोकतंत्र का भाषण दिए सिर्फ व्यापार और निवेश की भाषा बोल रहा है. यही वजह है कि कई देशों को चीन का मॉडल ज्यादा “प्रैक्टिकल” लगने लगा है. यह बदलाव आने वाले समय में वैश्विक राजनीति की दिशा बदल सकता है.

व्यापार की नई राजधानी बनता बीजिंग

दुनिया की सप्लाई चेन, टेक्नोलॉजी बाजार और मैन्युफैक्चरिंग का बड़ा हिस्सा अब चीन से जुड़ चुका है. अमेरिका और यूरोप की बड़ी कंपनियां भी चीन के बाजार को नजरअंदाज नहीं कर सकतीं. इलेक्ट्रिक कारों से लेकर AI और सेमीकंडक्टर को लेकर चीन तेजी से आगे बढ़ रहा है. यही वजह है कि वैश्विक निवेशक भी बीजिंग को नए आर्थिक केंद्र के तौर पर देखने लगे हैं. अगर आने वाले वर्षों में यह रफ्तार जारी रहती है तो दुनिया की आर्थिक धुरी पूरी तरह एशिया की ओर खिसक सकती है.

आज हालत यह है कि दुनिया की बड़ी कंपनियां चीन को छोड़ने की बात तो करती हैं, लेकिन छोड़ नहीं पातीं. चीन सिर्फ बाजार नहीं, मजबूरी बन चुका है. मोबाइल से लेकर मेडिकल सप्लाई तक, दुनिया का बड़ा हिस्सा चीन पर निर्भर है. यही आर्थिक ताकत बीजिंग को राजनीतिक ताकत भी दे रही है. और शायद यही कारण है कि अमेरिका अब चीन से लड़ते हुए भी उसके साथ व्यापार करने को मजबूर दिखाई देता है.

रूस-चीन दोस्ती क्यों अहम?

रूस और चीन की बढ़ती नजदीकियां अमेरिका के लिए सबसे बड़ी चिंता मानी जा रही हैं. दोनों देश लगातार सैन्य अभ्यास कर रहे हैं, ऊर्जा समझौते कर रहे हैं और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर एक-दूसरे का समर्थन कर रहे हैं. यूक्रेन युद्ध के बाद जब पश्चिमी देशों ने रूस पर प्रतिबंध लगाए, तब चीन ने खुलकर रूस के खिलाफ जाने से परहेज किया. इससे साफ हो गया कि दोनों देशों की रणनीतिक साझेदारी अब काफी गहरी हो चुकी है. कई विशेषज्ञ इसे “नई शीत युद्ध राजनीति” की शुरुआत भी मान रहे हैं.

रूस के पास सैन्य ताकत है और चीन के पास आर्थिक ताकत. अगर दोनों लंबे समय तक साथ खड़े रहते हैं तो यह अमेरिका के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन सकती है. यही वजह है कि पश्चिमी देशों में इस दोस्ती को लेकर बेचैनी बढ़ रही है. यह सिर्फ दो देशों की साझेदारी नहीं, बल्कि पश्चिमी प्रभाव के खिलाफ उभरता नया मोर्चा माना जा रहा है. आने वाले वर्षों में यही गठबंधन दुनिया की सबसे बड़ी रणनीतिक कहानी बन सकता है.

क्या बन रहा है नया वर्ल्ड ऑर्डर?

दुनिया अब उस दौर में प्रवेश करती दिख रही है जहां एक देश का दबदबा पूरी दुनिया पर नहीं रहेगा. अमेरिका, चीन, रूस, यूरोप, भारत और मध्य पूर्व के देश अपने-अपने प्रभाव क्षेत्र बनाने की कोशिश कर रहे हैं. इसे ही कई विशेषज्ञ “मल्टीपोलर वर्ल्ड” यानी बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था कह रहे हैं. इस नई व्यवस्था में बीजिंग की भूमिका बेहद अहम दिखाई दे रही है. चीन सिर्फ आर्थिक ताकत नहीं, बल्कि राजनीतिक फैसलों का केंद्र भी बनना चाहता है.
यह नया वर्ल्ड ऑर्डर सिर्फ नक्शे नहीं बदलेगा,

बल्कि गठबंधन भी बदल देगा. आने वाले समय में दोस्त और दुश्मन की परिभाषा बदल सकती है. देशों के रिश्ते विचारधारा से ज्यादा व्यापार और सुरक्षा हितों पर तय होंगे. यही कारण है कि आज अमेरिका के दोस्त भी चीन से रिश्ते खराब नहीं करना चाहते. दुनिया अब दो हिस्सों में नहीं, कई ताकतों में बंटती दिखाई दे रही है.

भारत के लिए क्या मायने?

भारत के लिए यह बदलती वैश्विक राजनीति बेहद अहम है. एक तरफ भारत अमेरिका के साथ रणनीतिक रिश्ते मजबूत कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ चीन और रूस भी उसके बड़े पड़ोसी और साझेदार हैं. ऐसे में भारत को बेहद संतुलित कूटनीति अपनानी होगी. अगर दुनिया का पावर सेंटर वास्तव में एशिया की ओर शिफ्ट होता है, तो भारत की भूमिका भी काफी महत्वपूर्ण हो जाएगी. भारत के पास यह मौका होगा कि वह नई विश्व व्यवस्था में खुद को एक बड़ी शक्ति के रूप में स्थापित करे.

लेकिन भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही होगी कि वह किसी एक खेमे का हिस्सा बने बिना अपनी स्वतंत्र पहचान बनाए रखे. चीन की बढ़ती ताकत भारत के लिए अवसर भी है और खतरा भी. अगर भारत आर्थिक और सैन्य रूप से खुद को मजबूत करता है तो वह एशिया की नई राजनीति में निर्णायक भूमिका निभा सकता है. आने वाला दशक भारत की विदेश नीति की असली परीक्षा साबित हो सकता है.

 फिलहाल जवाब  “हां” या “ना” में देना आसान नहीं  

सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या आने वाले समय में बीजिंग दुनिया की नई राजनीतिक राजधानी बन सकता है? फिलहाल इसका जवाब पूरी तरह “हां” या “ना” में देना आसान नहीं है. लेकिन इतना जरूर साफ हो चुका है कि चीन अब सिर्फ एक देश नहीं, बल्कि एक वैश्विक शक्ति केंद्र बन चुका है. ट्रंप और पुतिन जैसे नेताओं का लगातार बीजिंग पहुंचना इस बदलाव का बड़ा संकेत माना जा रहा है. दुनिया की राजनीति अब तेजी से बदल रही है और संभव है कि आने वाले दशक में ग्लोबल पावर का नक्शा पूरी तरह नया दिखाई दे.

अगर आने वाले वर्षों में दुनिया के बड़े फैसले बीजिंग में होने लगे, तो यह इतिहास का सबसे बड़ा भू-राजनीतिक बदलाव माना जाएगा. कभी दुनिया लंदन से चली, फिर वॉशिंगटन से. अब सवाल यह है कि क्या अगली सदी बीजिंग के नाम होने जा रही है? फिलहाल इतना तय है कि ड्रैगन अब सिर्फ जागा नहीं है, बल्कि दुनिया की सत्ता के दरबार में अपनी स्थायी कुर्सी लगाने की तैयारी कर चुका है.

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