ईरानी मिसाइलों के आगे लड़खड़ाया अमेरिका का सिस्टम, ट्रंप के बदले सुर ने बढ़ाया जंग और सियासत का सस्पेंस
ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ता तनाव अब एक नए मोड़ पर पहुंच गया है। जहां अमेरिकी डिफेंस सिस्टम की क्षमता पर सवाल उठ रहे हैं और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बदले सुर हालात की गंभीरता दिखा रहे हैं।

ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव ने अब एक नई बहस छेड़ दी है। यह बहस सिर्फ जंग की नहीं, बल्कि ताकत की असलियत की है। जिस सिस्टम पर अमेरिका को सबसे ज्यादा भरोसा था, वही अब सवालों में घिर गया है। इसी के बीच राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का बदला हुआ रुख इस पूरी कहानी को और गंभीर बना रहा है।
क्या अमेरिका पहली बार कमजोर दिखा?
कहानी की शुरुआत उस तस्वीर से होती है, जहां अमेरिका की ताकत पर पहली बार खुलेआम सवाल उठ रहे हैं। THAAD जैसे हाईटेक एयर डिफेंस सिस्टम के बावजूद ईरानी मिसाइलें अपने टारगेट तक पहुंच रही हैं। यही सिस्टम दुनिया का सबसे भरोसेमंद सुरक्षा कवच बताया गया था। लेकिन अब जब मिसाइलें उसे पार कर रही हैं, तो सवाल उठ रहा है कि क्या अमेरिका की तकनीक उतनी मजबूत नहीं रही, जितनी दिखाई जाती थी।
क्या ईरान ने खेल बदल दिया?
अब समझना जरूरी है कि यह सिस्टम क्यों लड़खड़ा रहा है। एक्सपर्ट मानते हैं कि THAAD आखिरी चरण में काम करता है। वहीं, ईरान ने अपनी मिसाइल रणनीति बदल दी है। अब वह मल्टीपल ट्रैजेक्टरी और डिकॉय का इस्तेमाल कर रहा है। इससे सिस्टम कन्फ्यूज हो जाता है। यही वह जगह है, जहां अमेरिका की तकनीक कमजोर पड़ती दिख रही है। इसी वजह से अब तुलना रूस के S-400 जैसे सिस्टम से होने लगी है।
क्या ट्रंप मजबूरी में बदले सुर?
अब नजर ट्रंप पर जाती है, जो राष्ट्र को संबोधित करने वाले हैं। लेकिन उनका बदला हुआ अंदाज कई सवाल खड़े कर रहा है। पिछले कुछ हफ्तों में उन्होंने कई बार अपना रुख बदला है। कभी सख्ती, तो कभी नरमी। यही उतार-चढ़ाव यह संकेत देता है कि जमीन पर हालात वैसी नहीं हैं, जैसी ऊपर से दिखाई जा रही हैं।
क्या जनता का भरोसा डगमगाया?
अमेरिका के भीतर की तस्वीर भी अहम है। एक सर्वे में सामने आया कि 61 प्रतिशत लोग ट्रंप की नीति से संतुष्ट नहीं हैं। वहीं, 37 प्रतिशत लोग उनके फैसलों का समर्थन कर रहे हैं। जब अपने ही देश में समर्थन कम होने लगे, तो फैसले भी बदलने लगते हैं। यही वजह है कि अब यह सवाल उठ रहा है कि क्या ट्रंप जंग से ज्यादा अपनी सियासी स्थिति को बचाने की कोशिश कर रहे हैं।
क्या जंग अब मोबाइल तक पहुंचेगी?
इस कहानी का सबसे खतरनाक पहलू यह है कि जंग अब मैदान तक सीमित नहीं रही। ईरान ने संकेत दिया है कि जवाबी कार्रवाई में बड़ी टेक कंपनियां भी निशाने पर हो सकती हैं। इनमें गूगल और ऐपल जैसी कंपनियां शामिल हैं। यानी खतरा अब सीमाओं से निकलकर टेक्नोलॉजी तक पहुंच सकता है।
क्या इजरायल अलग राह पर है?
इसी बीच इजरायल का सख्त रुख इस कहानी को और उलझा देता है। जहां ट्रंप नरमी दिखा रहे हैं, वहीं नेतन्याहू साफ कह रहे हैं कि जंग खत्म नहीं हुई है। जब सहयोगी देश ही अलग दिशा में सोचने लगें, तो रणनीति कमजोर पड़ जाती है। यही इस समय अमेरिका के सामने सबसे बड़ी चुनौती है।
क्या ट्रंप सच छिपा रहे हैं?
अब पूरी कहानी एक ही सवाल पर आकर टिक जाती है। क्या ट्रंप शांति चाहते हैं, या उन्हें शांति की तरफ धकेला जा रहा है? जब तकनीक उम्मीद के मुताबिक काम न करे, जब जनता सवाल उठाने लगे, और जब सहयोगी अलग रास्ते पर खड़े हों, तो सबसे ताकतवर देश भी मजबूरी में फैसले बदलता है। यही इस वक्त की सबसे बड़ी सच्चाई बनती जा रही है।


