इजरायल के साथ दुश्मनी खत्म! अब्राहम अकॉर्ड में शामिल होगा ईरान? ट्रंप का बड़ा दावा

डोनाल्ड ट्रंप के एक बयान ने मिडिल ईस्ट की राजनीति में नई चर्चा छेड़ दी है. उन्होंने संकेत दिए हैं कि भविष्य में ईरान भी अब्राहम अकॉर्ड का हिस्सा बन सकता है. हालांकि ईरान की ओर से अभी तक इस पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है.

Shraddha Mishra

नई दिल्ली: मध्य पूर्व की राजनीति में एक बार फिर हलचल तेज हो गई है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के एक बयान ने दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है. ट्रंप ने संकेत दिए हैं कि आने वाले समय में ईरान भी अब्राहम अकॉर्ड का हिस्सा बन सकता है. यह वही समझौता है जिसके जरिए अमेरिका ने इजरायल और कई अरब देशों के बीच रिश्तों को सामान्य बनाने की कोशिश की थी. 

हालांकि ईरान की ओर से अभी तक इस पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, लेकिन अगर ऐसा होता है तो यह क्षेत्र की राजनीति में एक ऐतिहासिक बदलाव माना जाएगा. क्योंकि अब तक ईरान खुद को इजरायल का सबसे बड़ा विरोधी बताता आया है.

ट्रंप ने बातचीत के बीच दिया बड़ा संकेत

हाल ही में ईरान के साथ जारी कूटनीतिक बातचीत के दौरान ट्रंप ने खाड़ी देशों की भूमिका की तारीफ की. उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर एक पोस्ट शेयर करते हुए मिडिल ईस्ट के देशों का समर्थन और सहयोग के लिए धन्यवाद दिया. ट्रंप ने लिखा कि अब्राहम समझौते में शामिल होने से क्षेत्रीय सहयोग और मजबूत होगा. इसी दौरान उन्होंने यह भी कहा कि संभव है भविष्य में ईरान भी इस समझौते का हिस्सा बन जाए.

पहले भी कर चुके हैं ऐसा दावा

यह पहली बार नहीं है जब ट्रंप ने ईरान को अब्राहम अकॉर्ड से जोड़ने की बात कही हो. इससे पहले भी वह इस तरह की संभावना जता चुके हैं. साल 2025 में इजरायल और हमास के बीच संघर्ष विराम की घोषणा के दौरान भी ट्रंप ने कहा था कि एक दिन ईरान इस समझौते में शामिल हो सकता है. हालांकि उस समय ईरान ने इस बयान को पूरी तरह खारिज कर दिया था. ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने साफ कहा था कि तेहरान कभी भी इजरायल को मान्यता नहीं देगा. ईरान लगातार फिलिस्तीन के समर्थन में खड़ा रहा है और इजरायल के खिलाफ अपनी सख्त नीति बनाए हुए है.

क्या है अब्राहम अकॉर्ड?

अब्राहम अकॉर्ड अमेरिका की मध्यस्थता में हुआ एक अहम समझौता है. इसकी शुरुआत साल 2020 में हुई थी. इसका मकसद अरब देशों और इजरायल के बीच वर्षों पुरानी दुश्मनी को खत्म कर रिश्तों को सामान्य बनाना था. इस समझौते के तहत सबसे पहले संयुक्त अरब अमीरात और बहरीन ने इजरायल के साथ औपचारिक संबंध स्थापित किए. बाद में मोरक्को और सूडान भी इसमें शामिल हो गए. इस समझौते को अमेरिका की बड़ी कूटनीतिक सफलता माना गया था.

इजरायल और ईरान के रिश्तों में गहरी दुश्मनी

ईरान और इजरायल के रिश्ते दशकों से बेहद तनावपूर्ण रहे हैं. हालांकि 1979 की इस्लामिक क्रांति से पहले दोनों देशों के संबंध सामान्य थे, लेकिन सत्ता परिवर्तन के बाद हालात पूरी तरह बदल गए. नई इस्लामिक सरकार ने इजरायल विरोध को अपनी विदेश नीति का अहम हिस्सा बना लिया. इसके बाद ईरान ने हमास, हिजबुल्लाह और हूती जैसे संगठनों को समर्थन देकर क्षेत्र में अपना प्रभाव बढ़ाया. दूसरी तरफ इजरायल और अमेरिका लगातार ईरान के परमाणु कार्यक्रम और उसकी क्षेत्रीय गतिविधियों को लेकर सख्त रुख अपनाते रहे हैं. हाल के वर्षों में दोनों देशों के बीच तनाव और ज्यादा बढ़ा है.

विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा हालात में ईरान का अब्राहम अकॉर्ड में शामिल होना आसान नहीं है. इजरायल और ईरान के बीच गहरी वैचारिक और राजनीतिक दुश्मनी अब भी बनी हुई है. इसके बावजूद ट्रंप का बयान इस बात का संकेत जरूर देता है कि अमेरिका आने वाले समय में मध्य पूर्व की राजनीति को नई दिशा देने की कोशिश कर सकता है. अगर कभी ईरान इस समझौते का हिस्सा बनता है तो यह पूरे क्षेत्र की रणनीतिक तस्वीर बदलने वाला कदम साबित हो सकता है.

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