तेहरान का अमेरिका को अल्टीमेटम, ‘हमले का हिसाब दो, वरना जवाब के लिए तैयार रहो'

ईरान और अमेरिका के बीच तनाव युद्धविराम के बावजूद बरकरार है, जिसमें ईरान ने हमलों के लिए मुआवजे की मांग करते हुए सख्त जवाब की चेतावनी दी है. इस टकराव का असर वैश्विक स्तर पर दिख रहा है, खासकर तेल कीमतों और पश्चिम एशिया की स्थिरता पर.

Shraddha Mishra

ईरान और अमेरिका के बीच जारी तनाव एक बार फिर गहरा गया है. हाल के हफ्तों में पश्चिम एशिया में संघर्ष भले ही अस्थायी रूप से थमा हो, लेकिन हालात अब भी बेहद नाजुक बने हुए हैं. तेहरान ने वाशिंगटन के खिलाफ कड़े तेवर अपनाते हुए न केवल जवाबी कार्रवाई की चेतावनी दी है, बल्कि हालिया हमलों के लिए मुआवजे की मांग भी दोहराई है.

अमेरिका पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने का आरोप

ईरानी राष्ट्रपति कार्यालय के संचार उप प्रमुख सैयद मेहदी तबताबाई ने अमेरिका पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने का आरोप लगाया. उन्होंने कहा कि अमेरिका को अपनी आक्रामक नीतियों से पीछे हटना चाहिए और क्षेत्र में तनाव बढ़ाने वाली गतिविधियों को बंद करना चाहिए. मीनाब में एक स्कूल पर हुए हमले का जिक्र करते हुए उन्होंने गंभीर आरोप लगाए और कहा कि ऐसे हमलों की भरपाई अमेरिका को करनी होगी.

ईरान ने स्पष्ट किया है कि वह खुद को शांति का समर्थक मानता है, लेकिन यदि कोई देश उस पर दबाव बनाने या ताकत दिखाने की कोशिश करेगा, तो उसे सख्त जवाब दिया जाएगा. इस बयान से संकेत मिलता है कि हालात भड़कने की स्थिति में तेहरान पीछे हटने के मूड में नहीं है.

 पूरा विवाद कब शुरू हुआ? 

यह पूरा विवाद 28 फरवरी को शुरू हुआ, जब अमेरिका और इज़राइल ने ईरान के ठिकानों पर संयुक्त हमले किए. इसके जवाब में ईरान ने भी अमेरिकी और इज़राइली ठिकानों को निशाना बनाया. साथ ही, होर्मुज जलडमरूमध्य में गतिविधियों को प्रभावित किया, जिससे वैश्विक तेल आपूर्ति पर असर पड़ा और कीमतों में तेज उछाल देखा गया.

हालांकि अप्रैल की शुरुआत में गुप्त कूटनीतिक प्रयासों के जरिए एक अस्थायी युद्धविराम हुआ, लेकिन दोनों देशों के बीच औपचारिक समझौता अब तक नहीं हो सका है. नतीजतन, क्षेत्र में तनावपूर्ण गतिरोध बना हुआ है, जहां बयानबाजी, सैन्य गतिविधियां और छोटे-मोटे घटनाक्रम किसी भी समय बड़े टकराव में बदल सकते हैं.

अमेरिकी नौसेना अब भी होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास तैनात है, जिसे वैश्विक तेल आपूर्ति के लिए बेहद अहम माना जाता है. अमेरिका इसे समुद्री मार्गों की सुरक्षा के लिए जरूरी बता रहा है, जबकि ईरान इसे अपनी संप्रभुता में दखल मानता है.

वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ा संघर्ष का असर 

इस संघर्ष का असर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी पड़ा है. तनाव के चरम पर तेल की कीमतें 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई थीं. भले ही फिलहाल कुछ राहत मिली हो, लेकिन बाजार अब भी अनिश्चितता के दौर से गुजर रहा है. जहाजरानी और बीमा लागत में भी बढ़ोतरी दर्ज की गई है.

इसके अलावा, इस टकराव ने क्षेत्रीय राजनीति को भी प्रभावित किया है. पश्चिम एशिया में शक्ति संतुलन बदल रहा है और ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर चल रही बातचीत भी जटिल होती जा रही है. कुल मिलाकर, यह संघर्ष केवल दो देशों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका प्रभाव वैश्विक स्तर पर महसूस किया जा रहा है.

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