खाली हो रहे दुनिया के तेल भंडार, क्या ट्रंप और ईरान की इस पीस डील से टलेगा संकट

अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य तनाव ने वैश्विक ऊर्जा बाजार की चिंताएं बढ़ा दी हैं. फारस की खाड़ी में जारी गतिरोध के चलते दुनिया भर में कच्चे तेल, पेट्रोल और अन्य ईंधनों के भंडार खतरनाक स्तर तक घट रहे हैं.

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नई दिल्ली: अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य तनाव ने वैश्विक ऊर्जा बाजार की चिंताएं बढ़ा दी हैं. फारस की खाड़ी में जारी गतिरोध के चलते दुनिया भर में कच्चे तेल, पेट्रोल और अन्य ईंधनों के भंडार खतरनाक स्तर तक घट रहे हैं. ऊर्जा विशेषज्ञों के अनुसार, यदि इस क्षेत्र से कच्चे तेल की आपूर्ति जल्द ही सामान्य नहीं की गई, तो आने वाले दिनों में दुनिया भर के उपभोक्ताओं को भारी महंगाई और ईंधन संकट का सामना करना पड़ सकता है. यही कारण है कि वैश्विक वित्तीय बाजारों की निगाहें अब अमेरिका और ईरान के बीच संभावित शांति समझौते पर टिकी हैं.

खाली होते रणनीतिक भंडार और अमेरिका की चुनौती

हालिया संघर्ष के शुरुआती हफ्तों में, विभिन्न देशों द्वारा जमा किए गए आपातकालीन तेल भंडारों ने वैश्विक स्तर पर पेट्रोल और डीजल की कमी नहीं होने दी. लेकिन अब ये रणनीतिक भंडार तेजी से खाली हो रहे हैं. वैश्विक महाशक्ति अमेरिका का 'रणनीतिक पेट्रोलियम रिजर्व' इस समय साल 1983 के बाद के अपने सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया है. अमेरिका लगातार अपनी घरेलू और अंतरराष्ट्रीय मांग को पूरा करने के लिए इस भंडार से तेल निकाल रहा है. जिससे उसकी अपनी ऊर्जा सुरक्षा पर भी दबाव बढ़ गया है.

 ट्रंप के दावे से बाजार को मिली मामूली राहत

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के एक हाल ही के बयान ने अंतरराष्ट्रीय बाजारों को थोड़ी राहत जरूर दी है. राष्ट्रपति ट्रंप ने दावा किया है कि अमेरिका और ईरान एक ऐतिहासिक शांति समझौते के बेहद करीब हैं. इस सकारात्मक संकेत के बाद वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतें नरम हुई हैं और यह 90 डॉलर प्रति बैरल के स्तर से नीचे आ गई हैं.

आयातकों की चिंता

बाजार विश्लेषकों का स्पष्ट कहना है कि जब तक होर्मुज जलडमरूमध्य से जहाजों की आवाजाही पूरी तरह सुरक्षित और सामान्य नहीं होती, तब तक तेल बाजारों में अस्थिरता का माहौल बना रहेगा. गौरतलब है कि पूरी दुनिया में प्रतिदिन लगभग 10 करोड़ बैरल कच्चे तेल की खपत होती है, जिसका एक बड़ा हिस्सा इसी समुद्री मार्ग से होकर गुजरता है.

तेल आयात पर निर्भर

तेल आयात पर पूरी तरह निर्भर रहने वाले एशियाई देशों, विशेषकर जापान और दक्षिण कोरिया में ईंधन का संकट सबसे गहरा है, क्योंकि वहां राष्ट्रीय भंडार तेजी से समाप्त हो रहे हैं. इसके विपरीत, खाड़ी देशों के पास कच्चे तेल का स्टॉक लगातार जमा हो रहा है क्योंकि समुद्री मार्ग बाधित होने के कारण वे अपनी क्षमता के अनुसार निर्यात नहीं कर पा रहे हैं.

क्या आगे बढ़ेगा संकट?

विशेषज्ञों का मानना है कि दुनिया के सामने कोई तात्कालिक पूर्ण ईंधन संकट नहीं है. लेकिन पेट्रोल, जेट ईंधन और हीटिंग ऑयल का वैश्विक स्टॉक सामान्य औसत से काफी नीचे है. यदि आगामी कुछ दिनों में अमेरिका-ईरान शांति वार्ता विफल होती है तो वैश्विक ऊर्जा बाजार पर दबाव हो जाएगा। जिसके गंभीर आर्थिक परिणाम पूरी दुनिया को भुगतने होंगे. First Updated : Saturday, 13 June 2026

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