AI डीपफेक वीडियो को लेकर गौतम गंभीर ने हाई कोर्ट का खटखटाया दरवाजा, 2.5 करोड़ का मांगा हर्जाना

गौतम गंभीर ने दिल्ली हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है. उन्होंने अपनी छवि और पहचान के दुरुपयोग के खिलाफ याचिका दायर की है, जिसमें कई बड़े मांग किए है.

Sonee Srivastav

नई दिल्ली: भारतीय क्रिकेट टीम के मुख्य कोच गौतम गंभीर ने अपनी छवि और पहचान के दुरुपयोग के खिलाफ दिल्ली हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है. उन्होंने AI से बने डीपफेक वीडियो और फर्जी ऑनलाइन सामग्री के कारण अपनी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचने का आरोप लगाया है. इस याचिका में उन्होंने 2.5 करोड़ रुपये के हर्जाने की मांग की है. यह मामला डिजिटल युग में बढ़ते डीपफेक खतरे को लेकर चिंता बढ़ा रहा है.

गंभीर के नाम पर फर्जी वीडियो

रिपोर्ट्स के अनुसार, कुछ लोगों ने एआई टूल्स जैसे फेस-स्वैप और वॉयस क्लोनिंग का इस्तेमाल करके गंभीर के नाम पर फर्जी वीडियो बनाए. इनमें उन्हें ऐसे बयान देते दिखाया गया जो उन्होंने कभी नहीं दिए.

ये वीडियो इंस्टाग्राम, एक्स , यूट्यूब और फेसबुक जैसे प्लेटफॉर्म्स पर तेजी से वायरल हुए. इससे उनकी छवि खराब हुई और लोगों में गलतफहमी फैली. गंभीर की कानूनी टीम का कहना है कि यह उनकी व्यक्तिगत प्रतिष्ठा पर हमला है.

याचिका में गंभीर की मांग  

याचिका में कई व्यक्तियों, सोशल मीडिया अकाउंट्स और तकनीकी प्लेटफॉर्म्स को प्रतिवादी बनाया गया है. गंभीर ने अदालत से मांग की है कि सभी फर्जी वीडियो और सामग्री तुरंत हटाई जाएं और ऐसे दुरुपयोग को आगे रोकने के लिए सख्त आदेश दिए जाएं. साथ ही उन्हें 2.5 करोड़ रुपये का हर्जाना मिले. यह कदम सार्वजनिक हस्तियों के लिए डीपफेक से बचाव का एक बड़ा उदाहरण है. 

डीपफेक का बढ़ता खतरा

AI टेक्नोलॉजी इतनी उन्नत हो गई है कि अब यथार्थवादी फर्जी वीडियो बनाना आसान हो गया है. ये वीडियो इतने सच्चे लगते हैं कि आम लोग सच-झूठ समझ नहीं पाते. विशेषज्ञों का मानना है कि डीपफेक से न सिर्फ व्यक्तियों की इज्जत दांव पर लगती है, बल्कि समाज में गलत सूचनाएं फैलकर बड़े नुकसान हो सकते हैं. राजनीति, मनोरंजन और खेल जगत में ऐसे मामले बढ़ रहे हैं.

गंभीर का बयान और महत्व

विश्व कप विजेता पूर्व क्रिकेटर और अब टीम इंडिया के कोच गौतम गंभीर ने कहा है कि यह सिर्फ उनका व्यक्तिगत मामला नहीं है. यह प्रौद्योगिकी के गलत इस्तेमाल और जवाबदेही की बड़ी समस्या है. उन्होंने जोर दिया कि ऐसी तकनीक से हर किसी की सुरक्षा जरूरी है. अदालत में यह केस व्यक्तित्व अधिकारों और डिजिटल नियमों पर नई बहस शुरू कर सकता है.

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