दिल्ली-एनसीआर में एलपीजी संकट के बीच सीएक्यूएम का बड़ा आदेश, अब लकड़ी जलाकर भी बना सकेंगे खाना
दिल्ली-एनसीआर में एलपीजी संकट को देखते हुए सीएक्यूएम ने उद्योगों, होटलों और रेस्टोरेंट्स को वैकल्पिक ईंधनों के अस्थायी इस्तेमाल की अनुमति दी. यह छूट एक महीने या अगले आदेश तक लागू रहेगी, ताकि प्राकृतिक गैस की कमी से उत्पादन प्रभावित न हो.

दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) में एलपीजी संकट को देखते हुए वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (सीएक्यूएम) ने एक अहम फैसला लिया है. आयोग ने उद्योगों, होटलों और रेस्टोरेंट्स को राहत देते हुए 'वैकल्पिक ईंधन' के इस्तेमाल में अस्थायी ढील दी है. यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है जब प्राकृतिक गैस की आपूर्ति में कमी और उद्योगों के परिचालन पर असर बढ़ रहा है.
फैसले के पीछे की मुख्य वजह क्या?
इस फैसले के पीछे मुख्य वजह वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति में व्यवधान और केंद्र सरकार द्वारा जारी ‘प्राकृतिक गैस (आपूर्ति विनियमन) आदेश, 2026’ है. प्राकृतिक गैस की कमी ने कई व्यावसायिक इकाइयों को परिचालन संबंधी समस्याओं में डाल दिया था. इस स्थिति की समीक्षा के बाद सीएक्यूएम ने पेट्रोलियम मंत्रालय और गैस वितरण एजेंसियों के साथ समन्वय कर यह निर्णय लिया.
आयोग ने जून 2022 के अपने पुराने आदेश (निर्देश संख्या 65) में संशोधन किया और उद्योगों और व्यावसायिक इकाइयों को अब वैकल्पिक ईंधनों का इस्तेमाल करने की अनुमति दी. इसके तहत प्राथमिक विकल्प के रूप में हाई-स्पीड डीजल, बायोमास और आरडीएफ पेलेट्स का उपयोग किया जा सकेगा. यदि ये ईंधन भी उपलब्ध नहीं हैं, तो अंतिम विकल्प के रूप में कोयला और मिट्टी का तेल इस्तेमाल करने की अस्थायी छूट दी गई है.
आदेश की महत्वपूर्ण शर्तें
इस आदेश की कुछ महत्वपूर्ण शर्तें भी हैं. सबसे पहले, यह छूट केवल एक महीने की अवधि के लिए या अगले आदेश तक प्रभावी रहेगी, जो भी पहले हो. दूसरा, यह आदेश दिल्ली और पूरे एनसीआर क्षेत्र में लागू होगा. तीसरा, वैकल्पिक ईंधन की अनुमति के अलावा जून 2022 के निर्देश संख्या 65 के बाकी सभी नियम और प्रविधान पहले की तरह ही लागू रहेंगे.
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) ने 12 मार्च 2026 को राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों को एक एडवाइजरी भी जारी की थी, जिसमें उन्होंने वैकल्पिक ईंधनों के इस्तेमाल की अनुमति देने की सलाह दी. इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि प्राकृतिक गैस की कमी के बावजूद औद्योगिक गतिविधियां बाधित न हों और उत्पादन में ठहराव न आए.
विशेषज्ञों का कहना है कि यह कदम औद्योगिक इकाइयों के लिए राहत भरा है, क्योंकि इससे परिचालन जारी रखने में मदद मिलेगी. वहीं पर्यावरण के दृष्टिकोण से इसे अस्थायी समाधान माना गया है, ताकि प्रदूषण पर नियंत्रण बनाए रखा जा सके और प्राकृतिक गैस की कमी से उत्पन्न संकट का सामना किया जा सके.


