‘मैं इस्तीफा नहीं दूंगी...’ CM पद से इस्तीफा नहीं देंगी ममता बनर्जी, अब क्या होगा? क्या कर सकते हैं राज्यपाल!
ममता बनर्जी के इस्तीफे से इनकार के बाद इंटरनेट पर लोग यही सवाल कर रहे हैं कि अब आगे होगा क्या? यदि ममता बनर्जी इस्तीफा नहीं देती हैं तो राज्यपाल क्या कर सकते हैं?

नई दिल्ली: पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस की हार के बाद भी पद छोड़ने से साफ इनकार कर दिया है। मंगलवार (05 मई 2026) को उन्होंने कहा कि ये नतीजे जनता का असली जनादेश नहीं, बल्कि एक सोची-समझी साजिश का हिस्सा हैं।
यदि इस्तीफा नहीं दिया तो क्या होगा?
दरअसल ममता के इस बयान के बाद बंगाल की सियासत में हलचल मच गई है। ममता बनर्जी के इस्तीफे से इनकार के बाद इंटरनेट पर लोग यही सवाल कर रहे हैं कि अब आगे होगा क्या? यदि ममता बनर्जी इस्तीफा नहीं देती हैं तो राज्यपाल क्या कर सकते हैं? ऐसे हालात में संविधान गवर्नर को क्या अधिकार देता है, इस पर बहस छिड़ गई है।
राज्यपाल के पास क्या हैं अधिकार?
आपको बताते चलें कि भारत के इतिहास में ऐसा पहली बार हो रहा है जब कोई मुख्यमंत्री हार के बाद भी पद छोड़ने से इनकार कर रहा है। संविधान के अनुच्छेद 164 के तहत मुख्यमंत्री की नियुक्ति राज्यपाल करते हैं।
यही अनुच्छेद उन्हें बहुमत खोने पर मुख्यमंत्री को बर्खास्त करने का अधिकार भी देता है। हालांकि, बर्खास्त करने से पहले राज्यपाल ममता बनर्जी से इस्तीफा मांग सकते हैं। यदि ममता इनकार करती हैं तो गवर्नर तुरंत विधानसभा भंग कर सकते हैं।
इसके अलावा, संवैधानिक संकट या कानून-व्यवस्था बिगड़ने की आशंका पर राज्यपाल अनुच्छेद 356 के तहत राष्ट्रपति शासन लगाने की सिफारिश भी कर सकते हैं। फिलहाल सबकी नजरें राजभवन पर टिकी हैं। ममता के रुख से साफ है कि बंगाल में सियासी टकराव और बढ़ेगा। अब देखना होगा कि राज्यपाल इस संवैधानिक पेंच को कैसे सुलझाते हैं।
चुनाव आयोग से थी लड़ाई, भाजपा से नहीं- ममता बनर्जी
गौरतलब है कि कोलकाता में प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान ममता बनर्जी ने बड़ा आरोप लगाया। उन्होंने कहा, “मेरे इस्तीफे का सवाल ही नहीं उठता, क्योंकि हमारी हार जनता के जनादेश से नहीं, बल्कि साजिश के तहत हुई है। मैं हारी नहीं हूं, मैं लोक भवन नहीं जाऊंगी। वे संवैधानिक मानदंडों के मुताबिक कार्रवाई कर सकते हैं।” ममता बनर्जी का दावा है कि तृणमूल कांग्रेस ने भाजपा के खिलाफ चुनाव नहीं लड़ा। उनकी असली लड़ाई निर्वाचन आयोग से थी। उनके मुताबिक, आयोग ने भाजपा के लिए काम किया।


