सुप्रीम कोर्ट में सोनम वांगचुक की हिरासत पर तीखी बहस, सरकार पर सवाल

लद्दाख के सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की हिरासत पर सुप्रीम कोर्ट में बड़ी बहस हुई। अदालत ने सरकार से कड़े सवाल पूछे। गांधीजी की तुलना को लेकर भी तीखी टिप्पणी हुई। मामला अब और गंभीर मोड़ पर है।

Lalit Sharma
Edited By: Lalit Sharma

सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान माहौल गंभीर रहा। जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस पीबी वराले की पीठ ने सरकार से सीधा सवाल किया। अदालत ने पूछा कि क्या बयान का अर्थ जरूरत से ज्यादा निकाला गया। न्यायाधीशों ने कहा कि पूरा संदर्भ पढ़ना जरूरी है। किसी एक पंक्ति के आधार पर निर्णय नहीं हो सकता। अदालत ने माना कि वांगचुक की बात चिंता जताने वाली भी हो सकती है। हर असहमति देशविरोध नहीं होती। इस टिप्पणी के बाद अदालत कक्ष में सन्नाटा छा गया।

क्या भाषण को गलत अर्थ में प्रस्तुत किया गया?

सरकार की ओर से एडिशनल सॉलिसिटर जनरल केएम नटराज ने दलील दी। उन्होंने कहा कि भाषण में मिले-जुले संकेत थे। उनका तर्क था कि इससे युवाओं को भड़काया जा सकता था। लेकिन अदालत ने कहा कि शब्दों को तोड़कर नहीं देखा जा सकता। न्यायाधीशों ने साफ कहा कि चिंता और उकसावे में फर्क होता है। यदि कोई हिंसा की आशंका जताता है तो वह चेतावनी भी हो सकती है। अदालत ने कहा कि जरूरत से ज्यादा अर्थ निकालना उचित नहीं। इससे बहस और तेज हो गई।

क्यों आया चर्चा में गांधी जी का नाम? 

सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि वांगचुक की तुलना महात्मा गांधी से नहीं की जानी चाहिए। उनका तर्क था कि यह बात सुर्खी बन सकती है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रपिता के नाम का अनुचित संदर्भ नहीं होना चाहिए। अदालत ने जवाब दिया कि बात को अलग संदर्भ में पढ़ा गया था। न्यायाधीशों ने स्पष्ट किया कि बाहर क्या लिखा जाएगा, इससे अदालत प्रभावित नहीं होती। यह क्षण सुनवाई का सबसे चर्चित हिस्सा बन गया।

क्या मीडिया की सुर्खियों से अदालत प्रभावित होती है?

सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि मीडिया इस टिप्पणी को अलग ढंग से दिखा सकता है। उन्होंने आशंका जताई कि यह खबर बन जाएगी। अदालत ने दो टूक कहा कि उसे मीडिया से कोई सरोकार नहीं। अदालत का दायित्व कानून की व्याख्या करना है। न्यायाधीशों ने कहा कि प्रश्न पूछना उनका अधिकार है। यदि सरकार को आपत्ति है तो वह तर्क दे। अदालत का यह स्पष्ट रुख पूरे मामले में अहम साबित हुआ।

क्या राष्ट्रीय सुरक्षा कानून का प्रयोग उचित था?

यह मामला राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत हिरासत से जुड़ा है। सरकार का कहना है कि लद्दाख सीमावर्ती क्षेत्र है। वहां कानून व्यवस्था बिगड़ सकती थी। इसलिए एहतियातन कार्रवाई की गई। दूसरी ओर वांगचुक की पत्नी गीतांजलि अंगमो ने कहा कि यह शांतिपूर्ण विरोध था। लोकतंत्र में सरकार की आलोचना अधिकार है। अदालत ने पहले भी हिरासत पर पुनर्विचार की बात कही थी। अब अदालत ने दस्तावेज और वीडियो रिकॉर्ड मांगे हैं।

क्या स्वास्थ्य का प्रश्न भी उठा?

सुनवाई के दौरान वांगचुक की सेहत का मुद्दा भी उठा। पत्नी ने अदालत को बताया कि स्वास्थ्य चिंता का विषय है। सरकार ने जवाब दिया कि नियमित चिकित्सीय जांच हो रही है। स्थिति सामान्य बताई गई है। अदालत ने इस पर भी रिपोर्ट मांगी है। न्यायाधीशों ने कहा कि हिरासत में व्यक्ति की सुरक्षा राज्य की जिम्मेदारी है। स्वास्थ्य को हल्के में नहीं लिया जा सकता। इससे मामले को मानवीय आयाम भी मिला।

आगे क्या दिशा लेगा यह मामला?

अब सुप्रीम कोर्ट ने अगली सुनवाई तय की है। सभी आवश्यक दस्तावेज पेश करने का निर्देश दिया गया है। देश की नजर इस निर्णय पर टिकी है। यह मामला केवल एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रहा। यह सवाल है कि विरोध की सीमा क्या है। और सरकार की शक्ति की हद क्या है। अदालत का फैसला आगे की राजनीतिक बहस को भी प्रभावित कर सकता है। फिलहाल अंतिम निर्णय का इंतजार है।

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