बिहार से INDIA गठबंधन के राज्यसभा उम्मीदवार होंगे तेजस्वी यादव...RJD की बैठक के बाद बड़ा ऐलान
राजद ने तेजस्वी यादव को राज्यसभा के लिए इंडिया गठबंधन का साझा उम्मीदवार घोषित किया है. पांचवीं सीट के इस कड़े मुकाबले में जीत हेतु उन्हें विपक्षी दलों के एकजुट समर्थन की अत्यंत जरूरत होगी.

पटना : बिहार की राजनीति में बड़ा फेरबदल हुआ है. आरजेडी ने तेजस्वी यादव को राज्यसभा के लिए अपना उम्मीदवार घोषित कर दिया है. पिछले चुनाव में हार और पारिवारिक कलह के बाद यह फैसला काफी चौंकाने वाला है. तेजस्वी को राज्यसभा भेजने का अर्थ उनके बिहार छोड़ने जैसा माना जा रहा है. जिससे कई कार्यकर्ता हैरान हैं. अब सबकी नजरें इस बात पर हैं कि क्या तेजस्वी बिहार की राजनीति को पीछे छोड़कर दिल्ली में विपक्षी गठबंधन की आवाज को नई मजबूती दे पाएंगे.
पांच सीटों का सियासी गणित
आपको बता दें कि बिहार में राज्यसभा की पांच सीटों के लिए चुनाव का बिगुल बज चुका है. मौजूदा विधानसभा के आंकड़ों के अनुसार. सत्ताधारी एनडीए के पास चार सीटों पर आसानी से जीत दर्ज करने का बहुमत है. चुनौती पांचवीं सीट को लेकर है. जिसके लिए विपक्ष ने तेजस्वी यादव पर दांव खेला है. राजद की बैठक में हुई इस घोषणा ने सियासी माहौल गर्मा दिया है. अब यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या महागठबंधन अपने इस बड़े चेहरे को दिल्ली भेजने में सफल हो पाता है.
जीत के लिए जादुई आंकड़ा
बिहार की एक राज्यसभा सीट जीतने के लिए किसी भी उम्मीदवार को 41 विधायकों के प्रथम वरीयता वाले वोट चाहिए होते हैं. महागठबंधन के पास अभी अपनी पार्टी और सहयोगियों को मिलाकर 35 विधायक मौजूद हैं. जीत की दहलीज तक पहुँचने के लिए तेजस्वी को कम से कम 6 और वोटों की दरकार है. यह चुनावी गणित काफी जटिल नजर आ रहा है. क्योंकि विपक्षी खेमे के लिए एक-एक विधायक का समर्थन जुटाना इस समय साख की लड़ाई बन चुका है.
विपक्षी एकजुटता की कड़ी परीक्षा
विपक्षी खेमे के 35 विधायकों में राजद के 25. कांग्रेस के 6 और वामपंथी दलों के 4 विधायक शामिल हैं. तेजस्वी की जीत के लिए अब एआईएमआईएम के 5 और बसपा के एक विधायक का रुख सबसे अहम होगा. अगर ये 6 विधायक तेजस्वी के पक्ष में मतदान करते हैं. तो विपक्ष का जादुई आंकड़ा 41 पर पहुँच जाएगा. हालांकि. ओवैसी की पार्टी का समर्थन हासिल करना किसी बड़ी कूटनीतिक जीत से कम नहीं होगा.
राजद कार्यकर्ताओं में मिली-जुली प्रतिक्रिया
तेजस्वी यादव को राज्यसभा भेजने की रणनीति ने राजद के भीतर हलचल पैदा कर दी है. पार्टी के कार्यकर्ता इस फैसले से थोड़े असहज महसूस कर रहे हैं. क्योंकि इसका अर्थ तेजस्वी का बिहार की राजनीति से ध्यान हटाना है. पिछले चुनाव की हार और लालू परिवार में छिड़े सत्ता संघर्ष के बाद नेतृत्व ने यह कदम उठाया है. समर्थकों को डर है कि कहीं उनके सबसे बड़े चेहरे की अनुपस्थिति में राज्य में पार्टी की पकड़ कमजोर न पड़ जाए.
नेता प्रतिपक्ष की जिम्मेदारी पर भी सवाल
तेजस्वी के दिल्ली जाने से बिहार में नेता प्रतिपक्ष की जिम्मेदारी पर भी सवाल खड़े हो गए हैं. यह कदम उनकी राजनीति के लिए एक नया मोड़ साबित हो सकता है. क्या यह उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर बड़े नेता के रूप में स्थापित करेगा या फिर बिहार की कमान उनके हाथ से खिसक जाएगी. यह आने वाला समय ही बताएगा. फिलहाल बिहार से लेकर दिल्ली तक इस नामांकन की चर्चा है और चुनावी मैदान में कड़ा मुकाबला होने की संभावना है.


