दिल्ली में एक साल बाद बदली सियासत की हवा, पोस्टरों ने जगाया तुलना और जनता के सवाल
दिल्ली में सरकार के एक साल पूरे होते ही सड़कों पर लगे पोस्टरों ने नई बहस छेड़ दी है। तुलना शुरू हो गई है। लोग पूछ रहे हैं कि शहर बदला या मुश्किलें बढ़ीं।

दिल्ली की सियासत में पोस्टर हमेशा संदेश देते हैं। इस बार पोस्टरों ने तुलना की बहस छेड़ी है। राजधानी की सड़कों पर अचानक नए होर्डिंग दिखे। इन होर्डिंग में लिखा था कि एक साल में दिल्ली बेहाल है। सबसे दिलचस्प बात यह रही कि पोस्टर में किसी नेता की तस्वीर नहीं थी। सिर्फ संदेश था और वही चर्चा का कारण बना। राजनीतिक जानकार इसे सीधे जनता की भावना से जोड़कर देख रहे हैं।
सरकार का एक साल पूरा होना सामान्य राजनीतिक घटना है। लेकिन दिल्ली में यह समीक्षा का मौका बन गया है। विपक्ष ने इसे जनता की आवाज बताया है। वहीं सत्तापक्ष इसे राजनीति करार दे रहा है। इस बीच जनता अपने अनुभव से राय बना रही है। सड़कों पर ट्रैफिक, अस्पतालों की लाइन और सेवाओं की चर्चा बढ़ी है। यही मुद्दे राजनीतिक बहस के केंद्र में आ गए हैं।
चर्चा में थे दिल्ली के शिक्षा माडल
दिल्ली में पहले शिक्षा और स्वास्थ्य मॉडल चर्चा में रहे थे। मोहल्ला क्लीनिक गरीबों के लिए राहत माने जाते थे। सरकारी स्कूलों में सुधार की बात होती थी। अब कुछ जगहों से सुस्ती की शिकायतें आ रही हैं। अस्पतालों में भीड़ और जाम की समस्या पर लोग सवाल उठा रहे हैं। पानी और सफाई से जुड़ी शिकायतें भी सामने आई हैं। इन मुद्दों ने पोस्टर राजनीति को और हवा दी है।
हमेशा होती है सियासत में तुलना
राजनीति में तुलना हमेशा होती है। दिल्ली में भी पुरानी सरकार की याद चर्चा में आई है। अरविंद केजरीवाल का मॉडल काम आधारित राजनीति के रूप में पेश किया गया था। शिक्षा और बिजली-पानी में राहत उसकी पहचान बनी। अब जब कुछ समस्याएं दिखती हैं तो तुलना स्वाभाविक हो जाती है। जनता पुराने और नए अनुभव को जोड़कर देख रही है। यही तुलना पोस्टरों के जरिए सड़कों तक पहुंच गई।
दिल्ली की सबसे बड़ी समस्या है पाल्यूशन
दिल्ली की सबसे बड़ी समस्या ट्रैफिक और प्रदूषण रही है। हाल के दिनों में जाम की शिकायतें बढ़ी हैं। कई इलाकों में टैक्सी चालक जाने से बचते दिखे। प्रदूषण भी समय-समय पर चिंता बढ़ाता है। नागरिक इसे रोजमर्रा की परेशानी बताते हैं। राजनीतिक बयानबाजी के बीच ये मुद्दे असली बहस बने हुए हैं। यही वजह है कि पोस्टर संदेश सीधे जनता से जुड़ गया।
बोटर भावनाओं से ज्यादा अनुभव से करता है फैसला
दिल्ली की राजनीति में जनता का मूड अहम होता है। यहां वोटर भावनाओं से ज्यादा अनुभव पर फैसला करता है। अगर सेवाओं में कमी महसूस होती है तो प्रतिक्रिया भी तेज होती है। पोस्टर उसी प्रतिक्रिया का प्रतीक माने जा रहे हैं। विपक्ष इसे जनभावना बता रहा है। सत्तापक्ष विकास के दावे कर रहा है। इस टकराव ने सियासत को और दिलचस्प बना दिया है।
सभी सवालों का आने वाला समय ही देगा जवाब
एक साल का शासन राजनीतिक यात्रा की शुरुआत माना जाता है। लेकिन इसी समय से समीक्षा भी शुरू हो जाती है। दिल्ली अब तुलना के दौर में खड़ी दिखाई देती है। जनता यह देखना चाहती है कि भविष्य की दिशा क्या होगी। क्या सुधार तेज होंगे या बहस और बढ़ेगी। पोस्टरों ने एक सवाल खड़ा कर दिया है। जवाब आने वाला समय ही देगा।


