रोक के बाद भी अवैध खनन...अरावली विवाद पर सख्त हुआ सुप्रीम कोर्ट, बोला- विशेषज्ञों की हाई पावर्ड कमेटी बनाई जाए

सुप्रीम कोर्ट ने अरावली पर्वतमाला में अवैध खनन को गंभीर और अपूरणीय पर्यावरणीय क्षति का कारण बताया है. कोर्ट ने खनन और उससे जुड़े मुद्दों की समग्र जांच के लिए पर्यावरण विशेषज्ञों और वैज्ञानिकों की समिति गठित करने का निर्णय लिया. विशेषज्ञों की रिपोर्ट आने तक अरावली क्षेत्र में नए खनन पट्टों पर रोक जारी रहेगी.

Utsav Singh
Edited By: Utsav Singh

नई दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट ने अरावली पर्वतमाला में हो रहे अवैध खनन को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त की है. अदालत ने कहा कि इस तरह की गतिविधियों से पर्यावरण को ऐसी क्षति पहुंच सकती है जिसकी भरपाई संभव नहीं है. न्यायालय ने स्पष्ट किया कि अरावली जैसे संवेदनशील क्षेत्र में अवैध खनन को किसी भी स्थिति में बर्दाश्त नहीं किया जा सकता.

विशेषज्ञ समिति गठित करने का फैसला

आपको बता दें कि मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ, जिसमें न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली भी शामिल हैं, ने अरावली क्षेत्र में खनन और उससे जुड़े मुद्दों की व्यापक जांच के लिए विशेषज्ञों की एक समिति गठित करने का निर्णय लिया है. यह समिति पर्यावरणविदों और वैज्ञानिकों से मिलकर बनेगी, जिन्हें खनन और पर्यावरण संरक्षण का विशेष अनुभव होगा.

चार सप्ताह में विशेषज्ञों के नाम सुझाने के निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी और एमिकस क्यूरी परमेश्वर को निर्देश दिया है कि वे चार सप्ताह के भीतर ऐसे विशेषज्ञों के नाम सुझाएं, जो इस समिति का हिस्सा बन सकें. समिति न्यायालय के प्रत्यक्ष निर्देश और निगरानी में कार्य करेगी.

अवैध खनन से दीर्घकालिक और गंभीर परिणाम 
अदालत ने कहा कि अवैध खनन के प्रभाव केवल तत्काल नहीं होते, बल्कि इसके दीर्घकालिक और गंभीर परिणाम सामने आते हैं. इससे न केवल पर्यावरण संतुलन बिगड़ता है, बल्कि जलस्तर, वन्यजीव और मानव जीवन भी प्रभावित होते हैं.

राजस्थान सरकार का आश्वासन
सुनवाई के दौरान अदालत को बताया गया कि कुछ स्थानों पर छिटपुट रूप से अवैध खनन की गतिविधियां सामने आई हैं. इस पर राजस्थान सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल के. एम. नटराज ने अदालत को आश्वस्त किया कि भविष्य में किसी भी प्रकार का अनधिकृत खनन नहीं होने दिया जाएगा.

अरावली की परिभाषा को लेकर जारी विवाद
अरावली पहाड़ियों की एक समान परिभाषा को लेकर लंबे समय से विवाद चल रहा है. इसी संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट ने ‘अरावली पहाड़ियों और पर्वतमालाओं की परिभाषा और उससे जुड़े मुद्दे’ शीर्षक वाले मामले का स्वतः संज्ञान लिया था.

पुराने निर्देशों पर अस्थायी रोक
सुप्रीम कोर्ट ने पिछले वर्ष 20 नवंबर को अरावली पर्वतमाला की एक समान परिभाषा को स्वीकार किया था, लेकिन बाद में 29 दिसंबर को इन निर्देशों पर अस्थायी रोक लगा दी गई. अदालत का कहना था कि परिभाषा से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण बिंदुओं पर अभी स्पष्टता आवश्यक है.

पर्यावरण संरक्षण से जुड़ी चिंताएं
कोर्ट ने यह भी सवाल उठाया कि यदि पहाड़ियों के लिए 100 मीटर ऊंचाई और दो पहाड़ियों के बीच 500 मीटर दूरी जैसे मानदंड अपनाए गए, तो क्या इससे अरावली का एक बड़ा हिस्सा पर्यावरण संरक्षण के दायरे से बाहर हो जाएगा. इन्हीं “महत्वपूर्ण अस्पष्टताओं” को दूर करने के लिए विशेषज्ञ समिति की भूमिका अहम मानी जा रही है.

नए खनन पट्टों पर प्रतिबंध जारी
विशेषज्ञों की रिपोर्ट आने तक सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात में फैले अरावली क्षेत्रों में नए खनन पट्टे देने पर रोक जारी रखी है. अदालत का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि पर्यावरण संरक्षण से कोई समझौता न हो.

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