इजरायल की हाईटेक हथियार तकनीक भारत को मिले तो बदलेगा रक्षा समीकरण, लेजर सिस्टम बना गेमचेंजर
भारत और इजरायल के बीच रक्षा सहयोग नए स्तर पर पहुंच सकता है। लेजर हथियार और एंटी बैलिस्टिक सिस्टम पर संयुक्त काम की चर्चा है। इससे भारत की सुरक्षा रणनीति मजबूत हो सकती है।

भारत और इजरायल के बीच रक्षा सहयोग पहले से मजबूत है। अब इसे और आगे ले जाने की तैयारी दिख रही है। पीएम मोदी की प्रस्तावित यात्रा से उम्मीदें बढ़ी हैं। दोनों देशों के बीच सुरक्षा सहयोग पर बड़ा समझौता संभव माना जा रहा है। खासतौर पर एयर डिफेंस सिस्टम पर संयुक्त विकास चर्चा में है। यह सहयोग भारत की रक्षा आत्मनिर्भरता को बढ़ा सकता है। रणनीतिक साझेदारी का नया अध्याय खुल सकता है। सूत्र बताते हैं कि बातचीत कई स्तरों पर चल रही है। टेक्नोलॉजी शेयरिंग पर भी सकारात्मक संकेत हैं। इससे दीर्घकालिक सैन्य सहयोग मजबूत होगा। दोनों देश क्षेत्रीय सुरक्षा में समान सोच रखते हैं।
क्या एंटी बैलिस्टिक सिस्टम भारत के लिए गेमचेंजर होगा?
भारत लंबे समय से मजबूत मिसाइल ढाल पर काम कर रहा है। एंटी बैलिस्टिक सिस्टम इस दिशा में अहम कदम हो सकता है। इसका मकसद दुश्मन की लंबी दूरी की मिसाइलों को रोकना है। प्रमुख शहरों और सैन्य ठिकानों की सुरक्षा प्राथमिकता है। इजरायल इस तकनीक में अनुभवी देश माना जाता है। उसके सिस्टम युद्ध में परखे जा चुके हैं। संयुक्त विकास से भारत को तेजी से प्रगति मिल सकती है। यह मिशन सुदर्शन की योजना को बल देगा। बहुस्तरीय रक्षा कवच बनाने में मदद मिलेगी। इससे रणनीतिक संतुलन भी बदल सकता है। भारत की एयर डिफेंस क्षमता नई ऊंचाई पर पहुंच सकती है।
क्या लेजर डिफेंस सिस्टम सबसे बड़ा आकर्षण है?
इजरायल का लेजर डिफेंस सिस्टम चर्चा का केंद्र बना हुआ है। इसे आयरन बीम नाम दिया गया है। यह नई पीढ़ी का एयर डिफेंस हथियार माना जाता है। पारंपरिक मिसाइलों से अलग इसकी कार्यप्रणाली है। यह प्रकाश ऊर्जा से लक्ष्य को नष्ट करता है। ड्रोन और रॉकेट खतरे से निपटने में प्रभावी है। तकनीक का ट्रांसफर बड़ा बदलाव ला सकता है। भारत के लिए यह भविष्य की सुरक्षा का अहम हिस्सा बन सकता है। युद्ध के स्वरूप में भी बदलाव संभव है। लेजर हथियार लागत और गति दोनों में बेहतर माने जाते हैं। इसलिए इसकी मांग बढ़ रही है।
क्या आयरन बीम की स्पीड युद्ध का गणित बदलेगी?
लेजर सिस्टम की सबसे बड़ी ताकत उसकी गति है। आयरन बीम प्रकाश की रफ्तार से हमला करता है। पारंपरिक मिसाइलों को लक्ष्य तक पहुंचने में समय लगता है। लेकिन लेजर हथियार तुरंत प्रतिक्रिया देते हैं। इससे रक्षा क्षमता ज्यादा प्रभावी हो जाती है। तेज प्रतिक्रिया ड्रोन स्वार्म खतरे को कम करती है। आधुनिक युद्ध में यह महत्वपूर्ण कारक है। तेज गति से सटीक हमला संभव होता है। इससे हवाई खतरों का जोखिम घटता है। भविष्य की लड़ाइयों में यह निर्णायक साबित हो सकता है। इसलिए इसे गेमचेंजर कहा जा रहा है।
क्या कम लागत इसे खतरनाक हथियार बनाती है?
लेजर डिफेंस की खासियत उसकी कम ऑपरेशनल लागत है। पारंपरिक इंटरसेप्टर मिसाइलें महंगी होती हैं। लेकिन लेजर सिस्टम बिजली से चलता है। प्रति शॉट लागत बेहद कम बताई जाती है। इससे लगातार हमलों से निपटना आसान होता है। दुश्मन के लिए हमला महंगा पड़ सकता है। लागत संतुलन युद्ध रणनीति बदल सकता है। रक्षा बजट पर दबाव भी कम होगा। लंबी अवधि में यह आर्थिक रूप से लाभकारी है। इसलिए कई देश इस तकनीक में रुचि दिखा रहे हैं। यह हथियार युद्ध अर्थशास्त्र को भी प्रभावित कर सकता है।
क्या स्टैंड-ऑफ मिसाइल और ड्रोन सहयोग बढ़ाएंगे?
दोनों देश स्टैंड-ऑफ हथियार और ड्रोन पर भी सहयोग बढ़ा सकते हैं। लंबी दूरी से हमला करने वाली तकनीक चर्चा में है। इससे सैनिक जोखिम कम होता है। ड्रोन आधारित युद्ध क्षमता तेजी से बढ़ रही है। संयुक्त विकास से भारत को तकनीकी बढ़त मिल सकती है। आधुनिक युद्ध में मानव रहित सिस्टम अहम बन चुके हैं। इजरायल इस क्षेत्र में अग्रणी माना जाता है। अनुभव साझा होने से प्रगति तेज होगी। निगरानी और हमले दोनों में सुधार होगा। इससे सामरिक विकल्प बढ़ेंगे। भारत की युद्ध तैयारी अधिक लचीली हो सकती है।
क्या यह साझेदारी भारत की रक्षा रणनीति बदलेगी?
भारत आत्मनिर्भर रक्षा उत्पादन पर जोर दे रहा है। इजरायल के साथ सहयोग इस लक्ष्य को गति देगा। उन्नत तकनीक मिलने से स्वदेशी परियोजनाएं मजबूत होंगी। एयर डिफेंस नेटवर्क अधिक प्रभावी बन सकता है। क्षेत्रीय सुरक्षा संतुलन पर भी असर पड़ेगा। चीन और पाकिस्तान की चुनौतियों के बीच यह अहम कदम होगा। तकनीकी सहयोग से रक्षा उद्योग को लाभ मिलेगा। संयुक्त रिसर्च और उत्पादन के रास्ते खुलेंगे। इससे निर्यात क्षमता भी बढ़ सकती है। दीर्घकालिक रणनीतिक साझेदारी और मजबूत होगी। भारत की सुरक्षा नीति में नई दिशा दिखाई दे सकती है।


