महाकुंभ भगदड़: जब 71 साल पहले संगम में हुई थी 800 लोगों की मौत, खौफनाक था मंजर

महाकुंभ मेला: 1954 में आयोजित महाकुंभ के दौरान मौनी अमावस्या के दिन एक भयानक भगदड़ हुई थी, जिसमें 800 से अधिक श्रद्धालुओं की जान चली गई. यह घटना न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक थी, बल्कि सुरक्षा व्यवस्था की कमी को भी उजागर करती है.

Ritu Sharma
Edited By: Ritu Sharma

Mahakumbh 2025: प्रयागराज में मौनी अमावस्या के अवसर पर सोमवार को हुए शाही स्नान से पहले देर रात एक बड़ी भगदड़ मच गई. इस दर्दनाक हादसे में कई लोगों की मौत हो गई और दर्जनों घायल हो गए. घटना के बाद वहां बिखरे कपड़े, जूते-चप्पल और अन्य सामान भयावह दृश्य प्रस्तुत कर रहे थे. यह घटना 1954 के महाकुंभ की उस त्रासदी की याद दिलाती है, जब मौनी अमावस्या के दिन ही हुई भगदड़ में 800 से ज्यादा लोग अपनी जान गंवा बैठे थे.

1954 का महाकुंभ - आजाद भारत की पहली बड़ी त्रासदी

आपको बता दें कि साल 1954 में आजाद भारत का पहला महाकुंभ प्रयागराज (तत्कालीन इलाहाबाद) में आयोजित हुआ था. इस महाकुंभ में 3 फरवरी को मौनी अमावस्या के दिन संगम तट पर लाखों श्रद्धालु जुटे थे. उसी दिन देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू भी महाकुंभ पहुंचे थे. कुछ रिपोर्ट्स के मुताबिक, नेहरू को देखने के लिए उमड़ी भीड़ के कारण भगदड़ मच गई. हालांकि, उस समय के अखबारों और कुछ अन्य रिपोर्ट्स में नागा साधुओं के जुलूस को भगदड़ की वजह बताया गया था.

भगदड़ की असली वजह - नागा साधुओं का जुलूस या नेहरू को देखने की होड़?

घटना के पीछे दो मुख्य कारण बताए जाते हैं-

नागा साधुओं का त्रिशूल

वहीं 3 फरवरी को शाही स्नान के दौरान नागा साधुओं के जुलूस को देखने के लिए लाखों लोग संगम तट पर मौजूद थे. भीड़ लगातार बढ़ती जा रही थी, लेकिन निकलने का रास्ता नहीं था. जब लोग जुलूस के बीच से बाहर निकलने की कोशिश करने लगे, तो नागा साधुओं ने अपने त्रिशूल श्रद्धालुओं की ओर घुमा दिए. इससे लोग घबरा गए और भगदड़ मच गई. कुछ लोग दबकर मर गए, तो कुछ गंगा में गिरकर डूब गए.

नेहरू को देखने की होड़

कुछ रिपोर्ट्स के अनुसार, उस दिन सुबह 10 बजे के करीब प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद त्रिवेणी रोड से गुजर रहे थे. जैसे ही यह खबर फैली, श्रद्धालु बैरिकेड्स तोड़कर आगे बढ़ने लगे. इसी दौरान नागा साधुओं की सवारी भी निकल रही थी. भारी भीड़ के कारण लोग बाहर नहीं निकल सके और देखते ही देखते अफरा-तफरी में सैकड़ों लोग कुचलकर दम तोड़ बैठे.

800 से 1000 लोगों की गई थी जान

बताते चले कि इस हादसे में 800 से 1000 लोगों की मौत का दावा किया गया था, जबकि 2000 से ज्यादा लोग घायल हुए थे. यह आजाद भारत की पहली बड़ी भगदड़ थी, जिसने पूरे देश को हिला कर रख दिया था. कुछ ही दिनों बाद बजट सत्र के दौरान प्रधानमंत्री नेहरू ने संसद में इस हादसे पर शोक व्यक्त किया था.

इसके अलावा आपको बता दें कि महाकुंभ जैसे विशाल धार्मिक आयोजनों में भीड़ प्रबंधन बेहद जरूरी होता है. 1954 की इस त्रासदी ने दिखाया कि जरा सी लापरवाही हजारों लोगों की जान ले सकती है. आज भी, ऐसे आयोजनों में कड़े सुरक्षा इंतजाम और यातायात प्रबंधन की जरूरत होती है ताकि श्रद्धालु सुरक्षित तरीके से अपने धार्मिक अनुष्ठान पूरे कर सकें.

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