स्काईरूट ने सफलतापूर्वक लॉन्च किया विक्रम-1, ISRO के श्रीहरिकोटा लॉन्चपैड से भरी उड़ान
स्काईरूट एयरोस्पेस ने शनिवार दोपहर 12:05 बजे ISRO के श्रीहरिकोटा स्थित लॉन्च सुविधा से अपने पहले ऑर्बिटल रॉकेट 'विक्रम-1' का सफल प्रक्षेपण किया.

नई दिल्ली: भारत के निजी अंतरिक्ष क्षेत्र ने शनिवार को एक नया इतिहास रच दिया। हैदराबाद स्थित स्काईरूट एयरोस्पेस ने आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से देश के पहले निजी तौर पर विकसित ऑर्बिटल रॉकेट विक्रम-1 का सफल प्रक्षेपण किया. बता दें, विक्रम-1 के सफल लॉन्च के बाद PM मोदी ने स्काईरूट की पूरी टीम को फोन कर बधाई भी दी. इस लॉन्च के साथ भारत के प्राइवेट स्पेस सेक्टर ने एक नया अध्याय शुरू कर दिया है और यह दिखा दिया है कि अब निजी कंपनियां भी अंतरिक्ष मिशनों में बड़ी भूमिका निभाने के लिए तैयार हैं.
बता दें, शुरुआत में इसे 11:30 बजे लॉन्च किया जाना था, लेकिन अंतिम काउंटडाउन के दौरान तकनीकी जांच के चलते कुछ मिनटों के लिए लॉन्च रोक दिया गया. सभी सिस्टम की जांच पूरी होने के बाद काउंटडाउन फिर से शुरू हुआ और रॉकेट ने सफलतापूर्वक उड़ान भर ली.
#WATCH | Andhra Pradesh: India's first privately developed orbital-class rocket, Vikram-1, launched from the Satish Dhawan Space Centre in Sriharikota
Built by Hyderabad-based Skyroot Aerospace, Vikram-1 is powered by three solid-fuel stages and a liquid orbital adjustment… pic.twitter.com/QQC9CPjcxH— ANI (@ANI) July 18, 2026
मिशन आगमन दिया गया नाम
इस मिशन को 'मिशन आगमन' नाम दिया गया है. इसका उद्देश्य रॉकेट की तकनीक और विभिन्न प्रणालियों का परीक्षण करना था. रॉकेट अपने साथ कई टेक्नोलॉजी पेलोड भी लेकर गया, जिनमें ग्रहा स्पेस, कॉस्मोसर्व, डीक्यूब्ड और स्काईरूट के अपने पेलोड शामिल हैं. इसके अलावा 18 कैरेट सोने से बना एक खास माइक्रो-आर्ट पीस, 'कॉस्मिक ब्लूम' नाम की कलाकृति और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का हस्तलिखित 'वंदे मातरम' पोस्टकार्ड भी अंतरिक्ष में भेजा गया.
कार्बन-कंपोजिट मटेरियल से बनाया गया
करीब सात मंजिला ऊंचा विक्रम-1 पूरी तरह हल्के और मजबूत कार्बन-कंपोजिट मटेरियल से बनाया गया है. इसमें तीन सॉलिड-फ्यूल स्टेज और एक लिक्विड ऑर्बिटल एडजस्टमेंट मॉड्यूल लगाया गया है, जो उपग्रहों को उनकी तय कक्षा में स्थापित करने में मदद करेगा. यह रॉकेट करीब 350 किलोग्राम तक के पेलोड को पृथ्वी की निचली कक्षा में पहुंचाने की क्षमता रखता है.
रॉकेट को क्यों दिया गया विक्रम नाम
इस रॉकेट का नाम भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के जनक डॉ. विक्रम साराभाई के सम्मान में रखा गया है. स्काईरूट इससे पहले 2022 में विक्रम-एस सबऑर्बिटल रॉकेट का सफल परीक्षण कर चुकी है. साल 2018 में इसरो के पूर्व वैज्ञानिकों द्वारा शुरू की गई इस कंपनी का लक्ष्य कम लागत में भरोसेमंद लॉन्च सेवाएं उपलब्ध कराना है. विशेषज्ञों का मानना है कि विक्रम-1 की सफलता से भारत के स्पेस सेक्टर को नई रफ्तार मिलेगी, निजी निवेश बढ़ेगा और वैश्विक सैटेलाइट लॉन्च बाजार में देश की स्थिति और मजबूत होगी.


