होर्मुज में अमेरिकी नाकाबंदी फेल? प्रतिबंध के बावजूद तेल लेकर मुंबई पहुंच रहे भारतीय टैंकर
अमेरिका की सख्त नाकाबंदी के बावजूद होर्मुज जलडमरूमध्य से जहाजों की आवाजाही जारी है. वैकल्पिक रास्तों और रणनीतियों के कारण वैश्विक तेल आपूर्ति बनी हुई है, जिससे समुद्री नियंत्रण की सीमाएं और बढ़ता तनाव सामने आ रहा है.

नई दिल्ली: पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच होर्मुज जलडमरूमध्य एक बार फिर वैश्विक चर्चा का केंद्र बन गया है. अमेरिका द्वारा कड़ी नाकाबंदी की घोषणा के बावजूद, हालात कुछ अलग तस्वीर पेश कर रहे हैं. दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री मार्गों में से एक इस क्षेत्र में जहाजों की आवाजाही पूरी तरह थमी नहीं है, बल्कि कई टैंकर अब भी अपने गंतव्य तक पहुंचने में सफल हो रहे हैं. यह स्थिति न केवल अमेरिकी रणनीति पर सवाल खड़े करती है, बल्कि वैश्विक व्यापार और ऊर्जा सुरक्षा को लेकर नई चिंताएं भी पैदा करती है.
अमेरिका ने ईरान पर दबाव बनाने के लिए होर्मुज जलडमरूमध्य में कड़ी निगरानी और नियंत्रण की रणनीति अपनाई है. इसके तहत ओमान की खाड़ी में अमेरिकी नौसेना की तैनाती की गई है. बावजूद इसके, कई जहाज इस रास्ते से गुजरने में सफल हो रहे हैं. हाल ही में ‘देश गरिमा’ नाम का एक भारतीय टैंकर इस तनावपूर्ण क्षेत्र से गुजरकर सुरक्षित मुंबई पहुंच गया. इस जहाज में कतर से करीब 97 हजार मीट्रिक टन कच्चा तेल लाया गया था.
रिपोर्ट्स के मुताबिक, 13 अप्रैल से शुरू हुई नाकाबंदी के बाद 30 से ज्यादा टैंकर इस मार्ग से गुजर चुके हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि यह स्थिति दिखाती है कि समुद्री नाकाबंदी को पूरी तरह प्रभावी बनाना आसान नहीं होता.
‘शैडो रूट’ की हो रही है चर्चा
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे ज्यादा चर्चा उन वैकल्पिक रास्तों की हो रही है, जिनके जरिए जहाज नाकाबंदी से बचकर निकल रहे हैं. कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि जहाज ईरान के तटीय जलक्षेत्र के पास रहते हुए पाकिस्तान के मकरान तट के समानांतर आगे बढ़ते हैं. इस रास्ते में वे अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में आए बिना ही एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में प्रवेश कर सकते हैं. हालांकि यह रास्ता तकनीकी रूप से संभव है, लेकिन इसमें राजनीतिक और कूटनीतिक जटिलताएं भी शामिल हैं, खासकर भारत और पाकिस्तान के बीच संबंधों को देखते हुए.
दूसरा सुरक्षित मार्ग भी मौजूद
एक अन्य संभावित रास्ता यह है कि जहाज ईरान के तट के साथ-साथ चलते हुए चाबहार बंदरगाह के पास पहुंचते हैं और वहां से अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में प्रवेश कर जाते हैं. इसके बाद वे सीधे भारत के पश्चिमी तट जैसे मुंबई, कांडला, कोच्चि या अन्य बंदरगाहों की ओर बढ़ सकते हैं. यह मार्ग अपेक्षाकृत सुरक्षित माना जाता है क्योंकि इसमें किसी अन्य देश के जलक्षेत्र में प्रवेश की जरूरत नहीं पड़ती और जहाज सीधे अंतरराष्ट्रीय नियमों के तहत यात्रा कर सकते हैं.
क्या कहते हैं अंतरराष्ट्रीय नियम
समुद्री कानूनों के तहत, हर देश अपने 12 समुद्री मील तक के जलक्षेत्र पर नियंत्रण रखता है. लेकिन ‘निर्दोष आवागमन’ के नियम के अनुसार, विदेशी व्यापारिक जहाज बिना किसी रुकावट के इन जलक्षेत्रों से गुजर सकते हैं, बशर्ते वे किसी तरह की गतिविधि न करें. इसके बावजूद, भारत और पाकिस्तान के बीच मौजूदा तनाव को देखते हुए इस मार्ग का इस्तेमाल जोखिम भरा माना जाता है. कई विशेषज्ञों का कहना है कि भले ही यह कानूनी रूप से संभव हो, लेकिन व्यावहारिक रूप से यह सुरक्षित विकल्प नहीं है.
भारतीय नौसेना की अहम भूमिका
इस पूरे संकट के दौरान भारतीय नौसेना भी सक्रिय भूमिका निभा रही है. जानकारी के अनुसार, जैसे ही कोई भारतीय जहाज होर्मुज क्षेत्र से बाहर निकलता है, नौसेना उसे ओमान की खाड़ी में एक सुरक्षित स्थान पर एस्कॉर्ट करती है. यह रणनीति जहाजों को अमेरिकी और ईरानी सैन्य गतिविधियों से दूर रखते हुए सुरक्षित मार्ग प्रदान करती है. इसके कारण जहाजों को पाकिस्तान के जलक्षेत्र के पास जाने की जरूरत नहीं पड़ती.
नाकाबंदी की सीमाएं और चुनौतियां
अमेरिका की नाकाबंदी केवल अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र तक सीमित है. जैसे ही कोई जहाज किसी देश के समुद्री क्षेत्र में प्रवेश करता है, वह अमेरिकी नियंत्रण से बाहर हो जाता है. यही वजह है कि ईरान, पाकिस्तान और भारत के जलक्षेत्र में अमेरिका सीधे हस्तक्षेप नहीं कर सकता. इस सीमा के चलते कई जहाज इन क्षेत्रों का इस्तेमाल करके नाकाबंदी से बच निकलते हैं. हालांकि अमेरिका ने अब तक कई जहाजों को वापस लौटने के लिए मजबूर किया है, लेकिन पूरी तरह नियंत्रण स्थापित करना अभी भी चुनौती बना हुआ है.
वैश्विक बाजार पर असर
इस पूरे घटनाक्रम का असर केवल क्षेत्रीय राजनीति तक सीमित नहीं है. होर्मुज जलडमरूमध्य से दुनिया का बड़ा हिस्सा तेल सप्लाई होता है. ऐसे में यहां किसी भी तरह की रुकावट वैश्विक बाजार को प्रभावित कर सकती है. तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और आपूर्ति की अनिश्चितता से कई देशों की अर्थव्यवस्था पर असर पड़ सकता है. ईरान पर दबाव बनाने की कोशिश के बावजूद, यह साफ हो रहा है कि आधुनिक समय में समुद्री नाकाबंदी को पूरी तरह लागू करना बेहद मुश्किल है.


