इस्लाम में क्या है जिहाद का मतलब? क्यों इस मामले पर आमने सामने हैं मदनी और आरिफ खान
भारत में जिहाद शब्द को लेकर दो प्रमुख मुस्लिम नेताओं के बीच बहस का मुद्दा सामने आया है, जिसमे उन्होंने जिहाद का सही परिभाषा बताया है.

पाकिस्तान में सत्ता, धर्म और नेतृत्व तीनों अक्सर बहस के केंद्र बन जाते हैं. हाल ही में जिस तरह भारत में जिहाद शब्द की व्याख्या को लेकर दो प्रमुख मुस्लिम नेताओं के बीच बहस सामने आई, उसी तरह पाकिस्तान में भी प्राधिकरण की मुहर होने के बावजूद कई मुद्दे अटक जाते हैं. संदर्भ भले अलग हों, लेकिन सवाल एक जैसा है, जब मंजूरी ऊपर से मिल ही गई, तो विवाद और भ्रम क्यों?
भारतीय संदर्भ में जिहाद पर चल रही चर्चा यह बताती है कि किसी शब्द, पद या विचार की वास्तविकता और उसकी सार्वजनिक छवि में अक्सर जमीन-आसमान का फर्क आ जाता है. इसी दृष्टि से समझने की कोशिश करें तो पाकिस्तान में सेना प्रमुख आसिम मुनीर का मामला भी इसी तरह की उलझनों से घिरा दिखता है, जहां सब कुछ तय होने के बाद भी नियुक्ति या अर्थ दोनों स्तरों पर भ्रम और विवाद बने रहते हैं.
जुल्म के खिलाफ खड़ा होना जिहाद है: आरिफ मोहम्मद
भोपाल में जमीयत उलमा-ए-हिंद के कार्यक्रम में मौलाना महमूद मदनी ने कहा कि जिहाद का अर्थ सिर्फ अत्याचार के खिलाफ संघर्ष है. उनका मानना है कि इस्लाम के दुश्मनों ने इस शब्द को हिंसा और फसाद से जोड़कर इसका मूल स्वरूप बिगाड़ दिया है.
दूसरी ओर, बिहार के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान का कहना है कि जुल्म के खिलाफ खड़ा होना जिहाद है, परंतु कुछ मदरसों में बच्चों को पढ़ाई जाने वाली परिभाषाएँ जिहाद को गलत दिशा दे देती हैं. उन्होंने कहा कि कुरान कहीं भी जबरन धर्म परिवर्तन की बात नहीं करता और जिहाद का अर्थ मानवता की रक्षा है.
दोनों नेता यह स्वीकार करते हैं कि जिहाद का सही अर्थ नैतिक संघर्ष है, लेकिन इसके बावजूद समाज में इसकी हिंसात्मक छवि क्यों बन गई, यही एक बड़ा सवाल है.
जिहाद की असली परिभाषा
इस्लामी विद्वानों के अनुसार, जिहाद का मूल अर्थ है संघर्ष या फिर प्रयास. इसको लेकर हदीसों में चार प्रकार बताए गए हैं- दिल से, जबान से, हाथ से और तलवार से. जिहाद अल-अकबर (बड़ा जिहाद) आत्म-सुधार और बुराइयों से लड़ने की प्रक्रिया है. जिहाद अल-असगर (छोटा जिहाद) अन्याय के खिलाफ खड़े होने को कहा गया है.
जिहाद की गलत छवि क्यों बनी?
समाज में जिहाद आज हिंसा का पर्याय बन गया है क्योंकि कट्टरपंथियों ने धार्मिक संघर्ष को हिंसक रूप दिया. पश्चिमी देशों ने इसे Holy War के रूप में प्रचारित किया. मुस्लिम समाज के भीतर ही कुछ समूह इसे एक-दूसरे के खिलाफ इस्तेमाल करने लगे. परिणाम यह हुआ कि जिहाद का मूल नैतिक और आध्यात्मिक अर्थ पीछे रह गया.


