कहां हैं मराठी ठेकेदार? मुंबई में हाशिए पर पहुंचा मराठी मानुष, 25 साल बाद भी लड़ रहा अस्मिता की लड़ाई

करीब तीन दशक की शिवसेना-बीएमसी सत्ता के बाद मुंबई में मराठी समाज के सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक हालात पर सवाल उठ रहे हैं. विस्थापन, सीमित अवसर और घटती आबादी मराठी असंतोष को दर्शाती है.

Yaspal Singh
Edited By: Yaspal Singh

मुंबईः करीब तीन दशकों तक मुंबई महानगरपालिका पर शिवसेना का वर्चस्व रहा. इस लंबे शासन काल में पार्टी की कमान अधिकतर समय उद्धव ठाकरे के हाथों में रही. आज इतने वर्षों बाद एक बुनियादी सवाल मराठी समाज के भीतर गूंजने लगा है. क्या इस दौर में मराठी समुदाय का सामाजिक-आर्थिक उत्थान हुआ या वह और पीछे चला गया?

मिलों की बस्तियों से कांच की इमारतों तक, बदलती मुंबई

कभी लालबाग, परेल, दादर, गिरगांव और शिवड़ी जैसे इलाके मुंबई की आत्मा माने जाते थे. यहां मिल मजदूरों की मेहनत और मराठी संस्कृति की जड़ें बसती थीं. लेकिन बीते 25–30 वर्षों में इन इलाकों का स्वरूप पूरी तरह बदल गया. बंद मिलों की जगह ऊंचे-ऊंचे ग्लास टावर खड़े हो गए और पारंपरिक मोहल्लों की पहचान धीरे-धीरे मिटने लगी.

मराठी समाज का शहर से बाहर धकेला जाना

पुनर्विकास के समय यह भरोसा दिलाया गया था कि स्थानीय मराठी परिवारों को उसी क्षेत्र में घर मिलेंगे. लेकिन हकीकत में ऐसा नहीं हुआ. बड़ी संख्या में मराठी लोग दक्षिण और मध्य मुंबई छोड़कर विरार, कर्जत, कसारा, बदलापुर जैसे दूरदराज़ इलाकों में बसने को मजबूर हुए. जिनके नाम पर राजनीति की गई, वही ‘मराठी मानुष’ आज अपने ही शहर में हाशिए पर खड़ा नजर आता है.

कहां हैं मराठी ठेकेदार?

मुंबई महानगरपालिका देश की सबसे अमीर नगर संस्थाओं में से एक है, जिसका सालाना बजट 50 हजार करोड़ रुपये से अधिक रहा है. सवाल यह उठता है कि इस विशाल आर्थिक शक्ति से कितने मराठी उद्यमी या ठेकेदार आगे आ सके? आलोचकों का कहना है कि बड़े ठेकों और परियोजनाओं में स्थानीय मराठी युवाओं को बढ़ावा देने के बजाय चुनिंदा प्रभावशाली समूहों को ही फायदा पहुंचाया गया. यदि पालिका सचमुच मराठी हितों के लिए काम कर रही थी, तो बड़े कारोबारी और ठेकेदारों में मराठी नाम लगभग नदारद क्यों हैं?

छोटे व्यवसायों तक सिमटता मराठी वर्ग

विशेषज्ञों का मानना है कि मराठी समाज को बड़े आर्थिक अवसरों से दूर रखकर छोटे-मोटे धंधों तक सीमित कर दिया गया, जबकि असली आर्थिक नियंत्रण कुछ गिने-चुने लोगों के हाथों में चला गया.

नारों की राजनीति और जमीनी हकीकत

मराठी मानुष, मराठी अस्मिता और मुंबई हमारी है जैसे नारे चुनावी मंचों पर असरदार रहे, लेकिन सत्ता में आने के बाद ये नारे ठोस नीतियों में तब्दील नहीं हो पाए. ऐसी आलोचना अब तेज हो रही है.

मराठी शिक्षा व्यवस्था की गिरावट

इसका सबसे बड़ा उदाहरण मनपा के मराठी स्कूल हैं. जहां कई मराठी माध्यम के स्कूल बंद हो गए या छात्र संख्या घटती चली गई, वहीं निजी अंग्रेजी स्कूलों की संख्या बढ़ती गई. आरोप है कि मराठी भाषा और शिक्षा को मजबूत करने के बजाय उसे सिर्फ राजनीतिक भावनाओं तक सीमित रखा गया.

बदलापुर-विरार की रोजमर्रा की थकाऊ यात्रा

आज बड़ी संख्या में मराठी कर्मचारी ठाणे, पालघर और रायगढ़ जिलों से रोज 4–5 घंटे की यात्रा कर मुंबई आते हैं. वे शहर के लिए काम तो करते हैं, लेकिन शहर में रहने का अधिकार धीरे-धीरे उनसे छिनता चला गया. आरोप है कि किफायती आवास की ठोस नीति न होने से पुनर्विकास का लाभ बिल्डरों को मिला, जबकि पुराने मराठी निवासी रखरखाव और अन्य कारणों से शहर से बाहर कर दिए गए.

चुनावी मौसम में बदला हुआ मतदाता

अब जब एक बार फिर महानगरपालिका चुनाव नजदीक हैं, तो मराठी हितों की बातें दोहराई जा रही हैं. लेकिन सवाल यह है कि क्या मतदाता इस बार पुराने वादों पर भरोसा करेंगे? जो मराठी परिवार पीढ़ियों से शिवसेना को वोट देते आए, वे अब भावनाओं से ज्यादा जवाब चाहते हैं. नौकरी, घर और अपने बच्चों के भविष्य को लेकर.

भावनाओं से आगे सोचने की मांग

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, लंबे समय तक सत्ता में रहने के बावजूद उद्धव ठाकरे मराठी समुदाय की समग्र प्रगति का ठोस रोडमैप तैयार नहीं कर पाए. आज का मराठी युवा साफ कह रहा है कि सिर्फ भाषणों और नारों से जीवन नहीं चलता.

घटती मराठी आबादी

मुंबई में मराठी आबादी का प्रतिशत गिरना केवल जनसंख्या का आंकड़ा नहीं, बल्कि एक बड़ी राजनीतिक और नीतिगत विफलता का संकेत माना जा रहा है. ‘कमीशन’ और ‘निजी लाभ’ जैसे आरोपों के बीच इस बार मराठी मतदाता नए सिरे से सोचने के मूड में दिख रहा है.

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