ढाका की जमीन पर वॉशिंगटन बनाम बीजिंग की जंग, भारत किस ओर खड़ा

बांग्लादेश में अमेरिका और चीन आमने-सामने दिख रहे हैं। हथियार, ड्रोन और नौसैनिक अड्डों की बात हो रही है। सवाल यह है कि भारत के पड़ोस में यह नई खींचतान किस दिशा में जाएगी।

Lalit Sharma
Edited By: Lalit Sharma

बांग्लादेश में चुनाव का मौसम है। लेकिन असली हलचल चुनाव से बड़ी है। अमेरिका खुलकर सामने आया है। उसने कहा है कि अगली सरकार को जरूरत के मुताबिक हथियार देगा। यह बयान सीधा चीन को संदेश है। चीन पहले से वहां सक्रिय है। ड्रोन फैक्ट्री का समझौता हो चुका है। अब सवाल उठता है कि क्या ढाका महाशक्तियों की नई जमीन बन रहा है।

क्या हथियारों की हो रही खुली बोली?

अमेरिका बंग्लादेश को कह रह है वह विकल्प देगा। विकल्प यानी एयर डिफेंस सिस्टम। साफ संकेत है कि चीनी सिस्टम का मुकाबला होगा। चीन कह रहा है दखल मंजूर नहीं। दोनों ताकतें खुलकर बोल रही हैं। बांग्लादेश अभी चुप है। लेकिन जमीन पर तैयारी तेज है। ऐसा लगता है जैसे हथियारों की खुली बोली लग रही हो। भारत की सीमा के पास ड्रोन फैक्ट्री बन रही है। यह समझौता चीन और बांग्लादेश के बीच हुआ है। ड्रोन अब सिर्फ कैमरा नहीं रहे। वे निगरानी और हमले दोनों कर सकते हैं। इससे भारत और अमेरिका दोनों चिंतित हैं। चटगांव में नौसैनिक ढांचा भी मजबूत हो रहा है। चीन ने पनडुब्बियां भी दी हैं। तो क्या यह सिर्फ कारोबार है या रणनीति?

क्या चुनाव तय करेगा ताकत का खेल?

बांग्लादेश में चुनाव अहम मोड़ पर है। शेख हसीना की पार्टी मैदान में नहीं है। वह अभी भारत में हैं। इस खाली जगह को कौन भरेगा यह बड़ा सवाल है। नई सरकार किस ओर झुकेगी यह तय करेगा भविष्य। क्या अमेरिका का प्रस्ताव असर डालेगा। या चीन की पकड़ और मजबूत होगी। ढाका की सत्ता पर मुहर बहुत कुछ बदल सकती है। भारत की पूर्वी सीमा संवेदनशील है।

अगर वहां चीन की मौजूदगी बढ़ती है तो असर होगा। हिंद महासागर में पहले ही प्रतिस्पर्धा है। अब जमीन पर भी खींचतान दिख रही है। भारत खुलकर कुछ नहीं कह रहा। लेकिन रणनीतिक हलकों में चिंता है। क्या भारत को नई रणनीति बनानी होगी। यह सवाल अब खुलकर पूछा जा रहा है।

क्या बांग्लादेश अगला यूक्रेन?

कुछ विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं। वे कहते हैं कि बड़ी ताकतें छोटे देशों में टकराती हैं। यूक्रेन इसका उदाहरण रहा है। क्या बांग्लादेश भी वैसी ही जमीन बन सकता है। फिलहाल हालात उस स्तर पर नहीं हैं। लेकिन संकेत साफ हैं। दोनों पक्ष प्रभाव बढ़ाना चाहते हैं। ढाका को बहुत सोचकर कदम रखना होगा। अमेरिका कहता है हम साथ हैं।चीन कहता है हम पुराने साझेदार हैं।

दोनों अपने-अपने तर्क दे रहे हैं।बांग्लादेश को संतुलन साधना होगा। यह सिर्फ रक्षा का सवाल नहीं।यह अर्थव्यवस्था और कूटनीति का भी मामला है।भारत भी इस खेल में चुप दर्शक नहीं रह सकता।आने वाले महीनों में तस्वीर साफ होगी।अभी मुकाबला जारी है।

ताजा खबरें

ट्रेंडिंग वीडियो

close alt tag