एक और मिडिल ईस्ट देश ने बना लिया Atom Bomb...ईरान के पूर्व कमांडर ने किया बड़ा दावा
परमाणु बम जिसका नाम सुनते ही पूरी दुनिया में खलबली मच जाती है, इसे लेकर ईरान के एक पूर्व कमांडर ने बड़ा दावा किया है. अपने इंटरव्यू में ईरान के पूर्व कमांडर ने एक ऐसा दावा किया है, जिसने पूरी दुनिया में हड़कंप मचा दिया है. उन्होंने कहा कि वर्तमान में सऊदी अरब के पास भी परमाणु बम है और इस बात की खबर इजरायल और अमेरिका दोनों को है.

नई दिल्ली : मध्य पूर्व में परमाणु खतरे की छाया फिर से गहरा गई है. फरवरी 2026 में ईरान-अमेरिका तनाव के बीच पूर्व इस्लामिक रेवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स कमांडर हुसैन कनानी ने RT को इंटरव्यू में बड़ा खुलासा किया. उन्होंने दावा किया कि सऊदी अरब के पास परमाणु बम है और अमेरिका व इजरायल इसे जानते हैं. यह बयान ऐसे समय आया जब ट्रंप प्रशासन ईरान को न्यूक्लियर हथियार न बनाने की शर्त थोप रहा है, जबकि ओमान में गुप्त वार्ताएं जारी हैं. कनानी का आरोप ईरान की रणनीति का हिस्सा लगता है, जो अमेरिका की दोहरी नीति पर सवाल उठाता है.
सऊदी अरब के पास भी परमाणु बम है
आपको बता दें कि पूर्व कमांडर हुसैन कनानी ने RT को बताया कि सऊदी अरब के पास अभी परमाणु बम है. उन्होंने कहा कि अमेरिका को इसकी अच्छी जानकारी है. जब उनसे दोबारा पूछा गया तो उन्होंने पुष्टि की कि यह दावा सही है और इजरायल भी जानता है. कनानी ने इसे अपनी खुफिया जानकारी पर आधारित बताया, लेकिन कोई सबूत नहीं दिया.
ईरान बम बनाता है तो सऊदी भी बनाएगा
सऊदी अरब ईरान को अपना मुख्य प्रतिद्वंद्वी मानता है. क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने 2018 और 2023 में कहा था कि अगर ईरान न्यूक्लियर बम बनाता है तो सऊदी भी ऐसा करेगा. सऊदी का प्रोग्राम विजन 2030 के तहत सिविलियन बताया जाता है, जिसमें बिजली और पानी शुद्धिकरण शामिल है. लेकिन वह पूर्ण न्यूक्लियर फ्यूल साइकल चाहता है.
नॉन-प्रोलिफरेशन ट्रीटी का सदस्य है सऊदी अरब
सऊदी अरब न्यूक्लियर नॉन-प्रोलिफरेशन ट्रीटी का सदस्य है, जो परमाणु हथियार बनाने पर रोक लगाता है. उसके पास अभी कोई ऑपरेशनल रिएक्टर नहीं है, लेकिन 2040 तक दो बड़े रिएक्टर बनाने की योजना है. ट्रंप और क्राउन प्रिंस के बीच 2025 के समझौते से अमेरिका सिविलियन रिएक्टर में मदद कर रहा है, लेकिन यूरेनियम संवर्धन पर विवाद है.
सऊदी को छूट है तो उसे क्यों नहीं...
विशेषज्ञों का कहना है कि कनानी के दावे में सबूत नहीं हैं. IAEA ने भी कोई टिप्पणी नहीं की. यह ईरान की रक्षात्मक रणनीति हो सकती है, ताकि अमेरिका की नीतियों को चुनिंदा दिखाया जाए. ईरान दुनिया को बताना चाहता है कि सऊदी को छूट है तो उसे क्यों नहीं. अमेरिका की चुप्पी भी रहस्यमय है.
ट्रंप का सऊदी से खास रिश्ता
अमेरिका ने इस दावे का खंडन नहीं किया, जो रणनीतिक चुप्पी लगती है. ट्रंप का सऊदी से मजबूत रिश्ता है. ईरान ओमान वार्ता में मिसाइल प्रोग्राम को अलग रखने की मांग कर रहा है. अगर दावा सही निकला तो NPT कमजोर होगा और तुर्की, मिस्र जैसे देश भी न्यूक्लियर दौड़ में शामिल हो सकते हैं.


